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Sanskrit Class 7 Chapter 12 Hindi Translation वीराङ्गना पन्नाधाया Summary
वीराङ्गना पन्नाधाया Meaning in Hindi
Class 7 Sanskrit Chapter 12 Summary Notes वीराङ्गना पन्नाधाया
भारत की भूमि वीरों की भूमि मानी जाती है और उसमें भी ‘मेवाड़’ को शौर्य, त्याग, निष्ठा आदि की श्रेणी में विश्व में सर्वोपरि माना गया है। मेवाड़ की भूमि पर कई पराक्रमी वीर तथा वीरांगणाएँ हुई हैं, वीरांगणाएँ की बात करें, तो ‘पन्नाधाय’ को प्रमुख स्थान प्राप्त है। पन्नाधाय को साहस, त्याग और निष्ठा की मूर्ति माना जाता है, क्योंकि उन्होने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह के प्राणों की रक्षा की थी। कालांतर में उदयसिंह, बनवीर को मारकर मेवाड़ के राजा बनें। उदयसिंह के पुत्र के रूप में महाराणा प्रताप ने जन्म लिया । उनका पराक्रम पूरे विश्व के हृदय – पटल पर आज भी अंकित है। पन्नाधाय के लिए एक उक्ति प्रसिद्ध है – “यदि पन्नाधाय नहीं होती, तो महाराणा प्रताप भी नहीं होते ।”

पाठ परिचय
एषा भारतभूमिः वीराणां त्यागधनानां भूमिः अस्ति । सर्वे भारतीया: ‘एषा भूमिः अस्माकं माता’ इति वदन्ति । अथर्ववेदे ‘ माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ इति उक्तम्। मातृभूमेः रक्षणार्थं भारतीयाः सर्वस्वम् अर्पितवन्तः। एतादृशानां भारतीयानां गणनायां महिलानां प्रभूतं योगदानम् अस्ति। त्यागे वीरतायां च महिलाः शत्रुनिबर्हणाः आसन् । एतादृशीषु वीराङ्गनासु राजस्थानस्य पन्नाधाया काचिद् विशिष्टा वीराङ्गना आसीत् । एषा साहसस्य त्यागस्य निष्ठायाः च अद्वितीया मूर्तिः आसीत् । अस्मिन् पाठे तस्याः त्यागस्य पराक्रमस्य च वर्णनं कृतम् । एषा इतिहासस्य स्वर्णिमाक्षरैः: लिखिता घटना अस्ति ।
शब्दार्थाः
त्यागधनानां = बलिदानियों की,
वदन्ति = कहते हैं,
सर्वस्वं = अपना सब कुछ,
प्रभूतं = अधिक,
त्यागे = त्याग में,
शत्रुनिबर्हणाः = शत्रुओं का विनाशक,
वीराङ्गनासु = वीर नारियों में,
साहसस्य = साहस का,
स्वर्णिमाक्षरैः = सोने के अक्षरों से

हिंदी अनुवाद
यह भारत भूमि वीर बलिदानियों की भूमि है। सभी भारतीय ‘इस भूमि को हमारी माता’ (ऐसा) कहते हैं। अथर्ववेद में ‘माता भूमि है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ’ ऐसा लिखा है।

मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीय अपना सब कुछ अर्पण कर देते हैं। ऐसे भारतीयों की गणना में महिलाओं का अधिक योगदान है। त्याग और वीरता में महिलाएँ शत्रुओं को नष्ट करने वाली थीं। इन वीरांगनाओं में राजस्थान की पन्नाधाय सबसे विशिष्ट वीरांगनाओं में से एक थीं। वे साहस, त्याग और निष्ठा की अद्वितीय मूर्ति थी। इस पाठ में उनके त्याग और पराक्रम का वर्णन किया गया है। यह इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखी घटना है।
Class 7 Sanskrit Chapter 12 Hindi Translation वीराङ्गना पन्नाधाया
1. षोडशे शतके मेवाडनगरे महाराणासङ्ग्रामसिंहः इति सुविख्यातः महाराजः आसीत्। तस्य द्वौ पुत्रौ विक्रमादित्यः उदयसिंहः च आस्ताम्। महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य भ्राता पृथ्वीराजः। बनवीरः पृथ्वीराजस्य अष्टादशसु पुत्रेषु अन्यतमः ।
सः बनवीरः महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य प्रथमं पुत्रं विक्रमादित्यं छलेन मारयित्वा मेवाडस्य शासनम् अकरोत् । ततः परमपि सः दुष्टबुद्धिः अचिन्तयत् यत्- “अहम् एकः एव उत्तराधिकारी भवेयम्। न कोऽपि मम प्रतिस्पर्धी स्यात्” इति ।
अतः कदाचित् रात्रौ सः उदयसिंहं मारयितुं कुतन्त्रम् अरचयत्। तद् ज्ञात्वा पन्नाधाया उदयसिंहस्य शयनस्थाने स्वपुत्रं चन्दनं शायितवती। सा तस्य दुष्परिणामं जानाति स्म । बनवीरः उदयसिंहस्य शयनागारम् आगच्छत्। तत्र सुप्तः चन्दनः एव उदयसिंहः इति मत्वा बनवीरः चन्दनम् अमारयत्।
शब्दार्थाः
षोडशे शतके = सोलहवीं शताब्दी में,
आस्ताम् = दो थे,
अन्यतमः = अनेकों में एक,
छलेन = कपट से,
दुष्टबुद्धिः = दुष्टबुद्धि वाला,
प्रतिस्पर्धी = प्रतिद्वंद्वी,
कदाचित् = कभी,
मारयितुं = मारने के लिए,
कुतन्त्रम् = षड्यंत्र,
धाया = दाई,
शायितवती = सुलाया,
दुष्परिणां = अनिष्ट को,
शयनागारम् = सोने के कक्ष को
संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक दीपकम् भाग-2 के ‘वीराङ्गना पन्नाधाया’ पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद – सोलहवीं शताब्दी में मेवाड़ नगर में महाराणा संग्रामसिंह विख्यात महाराजा थे। उनके दो पुत्र — विक्रमादित्य और उदयसिंह थे। महाराणा संग्रामसिंह के भाई पृथ्वीराज थे। बनवीर, पृथ्वीराज के अठारह पुत्रों में से एक था।
उस बनवीर ने महाराणा संग्रामसिंह के प्रथम पुत्र विक्रमादित्य को छल से मारकर मेवाड़ पर शासन किया। उस दुष्टबुद्धि ने सोचा कि “मैं अकेला ही उत्तराधिकारी रहूँगा । मेरा कोई भी प्रतिस्पर्द्ध (प्रतिद्वंदी) नहीं होगा।
अतः उसने किसी रात्रि में उदयसिंह को मारने का षड्यंत्र रचा। उसे जानकर पन्नाधाय ने उदयसिंह के शयन कक्ष में अपने पुत्र चंदन को सुलाया, वे उसके दुष्परिणाम को जानती थीं। बनवीर, उदयसिंह के शयन कक्ष में गया। वहाँ सोते हुए चंदन को उदयसिंह मानकर बनवीर ने चंदन को मार दिया।

2. पन्नाधायायाः निर्णयः अकल्पनीयः आसीत् । ‘व्यक्तिहितं न, राष्ट्रहितम् एव श्रेष्ठम्’ इति सा जानाति स्म । तस्याः पुत्रस्तु दिवङ्गतः, परं सा मेवाडराज्यं बनवीरस्य कुतन्त्रात् अरक्षत्। कालान्तरे सः एव उदयसिंहः युद्धे बनवीरं हत्वा मेवाडराज्यस्य राजा अभवत्। तस्य पुत्रः एव पराक्रमी योद्धा महाराणाप्रतापः। सः प्रतापः शौर्येण भारतीयानां हृदये चिरं स्थानं प्राप्नोत् । कथ्यते एव—“यदि पन्नाधाया स्वपुत्रस्य बलिदानं न अकरिष्यत् तर्हि उदयसिंहः न अभविष्यत् । यदि उदयसिंहः न अभविष्यत् तर्हि महाराणाप्रतापः अपि न अभविष्यत् ” । पन्नाधायायाः त्यागः शौर्यं च जगति आचन्द्रार्कं तिष्ठति । भारतीये इतिहासे वीराङ्गनानां गणनासु पन्नाधाया महत्तमं स्थानं प्राप्नोत् । पन्नाधायायाः बलिदानं सर्वान् शौर्यं, राष्ट्रभक्तिं कर्त्तव्यनिष्ठां, बलिदानं, विवेकं च शिक्षयति। उच्यते एव “यदि पन्नाधाया नाभविष्यत् तर्हि कुतो राणाप्रतापः”
शब्दार्थाः
अकल्पनीयः = चिंतन से परे,
व्यक्तिहितं = स्वार्थ,
राष्ट्रहितं = राष्ट्र का हित,
श्रेष्ठं = सर्वोपरि,
कालान्तरे = कुछ समय के बाद,
हत्वा = मारकर,
पराक्रमी = वीर,
शौर्येण = शूरता से,
जगति = संसार में,
आचन्द्रार्कं = सूर्य और चन्द्रमा,
गणनासु = गिनतियों में,
महत्तमम् = बहुतों में श्रेष्ठ ।
संदर्भ – पूर्ववत् ।
अनुवाद – पन्नाधाय का निर्णय अकल्पनीय अर्थात् चिंतन से परे था । ‘व्यक्ति का हित सर्वोत्तम नहीं है, बल्कि राष्ट्र का हित (सर्वोत्तम) है ‘वे यह जानती थीं कि उनके पुत्र की मृत्यु हो गई, लेकिन उन्होंने मेवाड़ राज्य को बनवीर के षड्यंत्र से बचाया ।
कुछ समय के बाद (कालांतर) उदयसिंह ने बनवीर को में युद्ध मार डाला और वे मेवाड़ राज्य के राजा बने। उनके पुत्र पराक्रमी योद्धा महाराणा प्रताप थे। उस प्रताप की वीरता ने भारतीयों के हृदय में अब तक अपनी जगह बनाई हुई है।
ऐसा कहा जाता है—“यदि पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान न किया होता, तो कोई उदयसिंह नहीं होता । यदि उदयसिंह नहीं होता, तो महाराणा प्रताप नहीं होता।” पन्नाधाय का त्याग और साहस ‘चंद्रमा’ और ‘सूर्य’ के समान संसार में छाया (फैला हुआ है। भारतीय इतिहास में विरांगणाओं की गणना में पन्नाधाय ने महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है।
पन्नाधाय का बलिदान सभी को शौर्य, राष्ट्रभक्ति, कर्त्तव्यनिष्ठा, बलिदान और विवेक की शिक्षा देता है। जैसा कि कहा गया है- “यदि पन्नाधाय नहीं होतीं, तो राणा प्रताप कहाँ होते”
उच्चैः पठन्तु, अवगच्छन्तु च।
लङ्-लकारः (भूतकाले एतस्य लकारस्य प्रयोगः भवति)
पठ् धातुः (परस्मैपदम् )

वयं वाक्येषु लङ्लकारस्य प्रयोगं पठामः ।
