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स्वदेश कविता Class 8 Summary in Hindi
स्वदेश Class 8 Hindi Summary
स्वदेश कविता का सारांश – स्वदेश Class 8 Summary in Hindi
यह कविता देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत है। कवि ने इसमें उस व्यक्ति की आलोचना की है, जिसके हृदय में अपने देश के लिए प्रेम नहीं है। कवि कहते हैं कि ऐसा हदय पत्थर के समान है। एक सच्चे इंसान का जीवन वही है, जो अपने देश, समाज और जाति के लिए कुछ कर सके। यदि किसी के जीवन में भावनाएँ, साहस और कर्म नहीं हैं, तो उसका जीवन व्यर्थ है।

कवि आगे कहते हैं कि जिस देश की मिट्टी में हम पले-बड़े, जहाँ से हमें अन्न, जल, परिवार और संस्कृति मिली, उसके प्रति प्रेम करना हमारा कर्त्तव्य है। भारत एक समृद्ध देश है, जिसने हमें रत्लों और संपदा से नखाज़ा है। यदि फिर भी किसी को अपने देश से प्रेम नहीं है, तो वह धरती पर बोझ है। अंत में कवि कहते हैं कि मृत्यु निश्चित है, लेकिन जीवन सार्थक तभी है, जब-उसमें देश के लिए बलिदान देने की भावना हो। हमारे पास शक्ति और साधन दोनों हैं, वस ज़रूरत है, तो देश के लिए समर्पित भावना की। यही सच्चे हृदय का प्रमाण है।
स्वदेश कविता हिंदी भावार्थ Pdf Class 8
स्वदेश सप्रसंग व्याख्या
काव्यांश 1
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो जीवित जोशा जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।
जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं।।
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुँच सकेगा पार नहीं।
शब्दाये :
- पत्थर – कठोर, भावहीन हुदय (यहों मनुष्य के संवेदनहीन होने का प्रतीक)
- च्वदेश – अपना देश
- जीवित जोशा – जीवंत उत्साह, जीवन में उमंग
- सार – महत्व, मूल्य
- संसार-संग – समाज के साथ, दुनिया के साथ
- साहस – हिम्मत, वीरता
- पार – लक्ष्य की प्राप्ति, सफलता।
संदर्भ : प्रस्तुत काव्यांश हमारी पात्यपुस्तक ‘मल्हार’ की कविता ‘स्वदेश’ से लिया गया है। इस कविता के रचयिता प्रसिद्ध देशभक्त कवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ हैं।
प्रसंग : इस काव्यांश में कवि ने देशभक्ति, आत्मबल, साहस और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का वर्णन किया है।
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व्याख्या : कवि कहते हैं कि जिस व्यक्ति के हट्य में अपने देश के प्रति प्रेम नहीं है, उसका हृदय, हदय नहीं, बल्कि पत्थर है अर्थात् पत्थर के समान कठोर है। जिस व्यक्ति में अपने देश के लिए कुछ करने का न तो उत्साह और न ही जोश है, ऐसे व्यक्ति का संपूर्ण जीवन व्यर्थ है अर्थात् उसके जीवन का कोई महत्व नहीं है।
कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति समाज, देश और दुनिया के साथ कदम-से-कदम मिलाकर नहीं चल पात्ता अर्थात् जो समाज में कोई सहयोग नहीं करता है, उसके कठिन समय में (उसे कभी परेशानी आने पर) समाज भी उसका साथ नहीं देता है। जिसने अपने साहस को त्याग दिया है अर्थात् जिसने मेहनत करना छोड़ दिया, अपने आप पर विश्वास करना ही छोड़ दिया है, वह कभी भी अपने लक्ष्यों तक नहीं पहुँच सकता अर्थात् किसी भी कार्य में सफल नहीं हो सकता और कभी भी अपने सपनों को पूरा नहीं कर सकता।

विशेष :
- कविता में देशम्रेम, साहस और सामाजिक उत्तरदायित्व की प्रेरणा है।
- सरल भाषा में गहरा संदेश प्रस्तुत किया गया है।
- जीवन को सार्थक बनाने के लिए उददेश्यपूर्ण कार्य और उत्साह को आवश्यक बताया गया है।
काव्यांश 2
जिससे न जाति-उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं।।
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हुदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
जिसकी मिट्टी में उगे बड़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
माता-पिता बंधु जिसमें,
हैं जिसके राजा-रानी।।
शख्यांध :
- जाति-उद्धार – समाज या राष्ट्र की उन्नति
- रस-धार भावना की बहती हूई धारा
- दाना-पानी – जीवन यापन के संसाधन
- बंधु – रिश्तेदार
- भाई – बाँधत।
संदर्भ : पूर्ववत्।
प्रसंग इस काव्यांश में कवि ने देशप्रेम को हर नागरिक का सबसे बड़ा धर्म बताया है। कबि के अनुसार, जो अपने देश के लिए कुछ नहीं करता, वह स्वयं भी सच्चे अर्थों में उद्धार के योग्य नहीं होता।
व्याख्या : कवि कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने जाति अर्थात् मानव जाति के उद्धार के लिए कभी कोई सहयोग नहीं किया, किसी का भला नहीं किया, उसका भी कभी भला नहीं हो सकता। जिस व्यक्ति के हुदय में राष्ट्र के प्रति भावनाओं अर्थात् प्रेम, करुणा, सहानुभूति आदि का अभाव है, जिसके अंदर प्रेम और दया की धारा नहीं बहती और जो अपने देश से प्रेम नहीं करता, उसका हदय पत्थर के समान कठोर है। वह मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं है, बल्कि पत्थर के समान है।
जिस देश की धरती पर हम पले-बढ़े हैं, जिसने हमें अन्न-जल दिया है और जिस देश में हमारे माता-पिता और भाई-बंधु रहते हैं और जिस देश के हम राजा-रानी अर्थात् नागरिक हैं, वह हमारा देश है। ये पंक्तियाँ देश और मातृभूमि के प्रति सम्मान की भावना को व्यक्त करती है।
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विशेष :
- कविता देश के प्रति कर्तव्य और आत्भीय संबंध को दर्शाती है।
- इसमें मातृभूमि के प्रति भावात्मक जुड़ाव को हृदयस्पर्शी रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- सरल शब्दों में गहन विचार और राष्ट्रे्रेम का भाव है।
काव्यांश 3
जिसने कि खजाने खोले हैं,
नव रत्न दिए हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी।।
उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं।
निश्चित है निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।
शब्दाथ्य :
- खजाने – बहुमूल्य संपदा
- नव रत्न – नए अमूल्य रत्न (यहाँ ज्ञान, संस्कृति, साधन आदि)
- लासानी – अनुपम, जिसकी कोई तुलना न हो
- ज्ञानी – विद्रान
- दीवानी – आकर्षित, बहुत प्रेम करने वाली
- पसीजा – द्रवित हुआ, करुणा या भावुकता से भर गया, भू का भार धरती पर बोझ
- निश्चित – तय
- निस्संशय – बिना किसी संदेह के।
संदर्भ : पूर्ववत्।
प्रसंग : इस काव्यांश में कक्षिभे भारत की गौरवशाली उपलब्धियों और उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा का वर्णन किया है।
व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि कहते हैं कि जिसने संसार में खजाने खोले हैं अर्थात् जिसने अपार धन-संपत्ति अर्जित की है, जिसने अनमोल रत्न दिए हैं, जिसकी प्रसिद्धि ऐसी है कि ज्ञानी लोग भी उस पर मोहित होते हैं और जिस पर दुनिया दीवानी है, ऐसे व्यक्ति किसी भी बात पर, किसी भी परिस्थिति में, किसी भी दु:ख-सुख में, पिघलता नहीं है अर्थात् द्रवित नहीं होता, दया नहीं करता, प्रभावित नहीं होता। ऐसा व्यक्ति पृथ्वी पर बोझ के समान है, उसका पृथ्वी पर रहना व्यर्थ है। निश्चित रूप से, इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक दिन बह जीवन समाप्त हो जाएगा और आत्मा शरीर को छोड़कर चली जाएगी, इसलिए सांसारिक वस्तुओं के मोह में न पड़कर ईश्वर भक्ति में लीन होना ही उचित है।
विशेष
- इसमें देश के प्रति निष्ठा न रखने वाले व्यक्तियों पर कठोर टिप्पणी की गई है।
- भाषा सरल है, लेकिन भाव अत्यंत प्रभावशाली हैं।
काव्यांश 4
है काल-दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को।।
सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहों तलवार नहीं।
वह हदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
शख्साथी :
- काल-दीप – समय कपी दीपक,
- परताने – दीपक पर जान देने वाले कीट (यहाँ बलिदानी देशभक्त),
- तोप – युद्ध में प्रयोग होने वाली भारी बंदूक,
- तलवार – युद्ध का शस्त्र।
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संदर्भ : पूर्ववत्।
प्रसंग इस काव्यांश में कवि ने जीवन की क्षणभंगुरता का संकेत देते हुए देश के लिए बलिदान को गौरवपूर्ण बताया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि आत्मबल से बढ़कर कोई शक्ति नहीं होती, यदि मन में देश के लिए प्रेम और साहस हो।
व्याख्या : कवि कहते हैं कि समय का दीपक हमेशा जलता रहता है और पतंगों (कीट) की तरह मनुष्य को भी अंतत: मृत्यु को प्राप्त होना है। जिस प्रकार पतंगे दीपक की लौ की ओर आकर्षित होकर उसके पास जाते हैं और जलकर नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी जीवन के आकर्षण में फँसा रहता है और अंतत: मृत्यु को प्राप्त होता है। कवि कहते हैं कि मनुष्य के पास अपनी क्षमताओं और इच्छाशक्ति से सब कुछ करने की शक्ति है। कवि प्रश्न करता है कि क्या किसी के पास तोष या तलवार नहीं है (जो देश की रक्षा के लिए आवश्यक हो सकती है) और फिर कहता है कि वह हुदय नहीं बल्कि पत्थर है, जिसमें अपने देश के प्रति प्रेम नहीं है।
विशेष
- इसमें देश के लिए मर मिटने वालों को परवाने की संज्ञा दी गई है, जो अत्यंत प्रभावशाली है।
- सरल लेकिन म्रभावशाली भाषा के माध्यम से युवाओं को जागसूक करने बाला संदेश दिया गया है।