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हरिद्वार Class 8 Summary in Hindi
हरिद्वार Class 8 Hindi Summary
हरिद्वार का सारांश – हरिद्वार Class 8 Summary in Hindi
प्रस्तुत पाठ में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका के संपादक के नाम पत्र लिखते हुए अपनी हरिद्वार यात्रा का रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है।
हरिद्वार का प्राकृतिक सौंदर्य और पवित्रता
पत्र में हरिद्वार को एक पुण्य (पवित्र) भूमि बताया गया है जहाँ प्रवेश करते ही मन शुद्ध हो जाता है। यात्री हरिद्धार के प्राकृतिक सौंदर्य से अत्यधिक प्रभावित होते हैं, जो हरे-भरे पर्बतों और उन पर फैली लता-कुँजों से घिरा है। वे यहाँ के बड़े वृक्षों की तुलना तपस्या करते साधुओं से करते हैं, जो फल-फूल और अपनी हर चीज़ से दूसरों का भला करते हैं तथा जलने पर भी कोयला और राख देते हैं। यहाँ वर्षा के बाद की हरियाली को हरे गलीचे जैसा बताया गया है, जहाँ पक्षी निडर होकर चहचहाते हैं।

गंगा नदी का अनुपम वर्णन
पत्र का मुख्य आकर्षण पवित्र गंगा नदी का वर्णन है। गंगा की धारा को राजा भगीरथ की कीर्ति की लता के समान बताया गया है। इसका जल अत्यंत शीतल, मीठा और स्वच्छ है। यात्री गंगा के वेग से उत्पन्न शब्द और पवित्र जलकणों को लाने वाली शीतल वायु के स्पर्श से पावन होने का अनुभव साझा करते हैं। गंगा यहाँ दो धाराओं में बँट जाती है-नील धारा और मुख्य गंगा धारा। इनके बीच में एक नीचा पर्वत और नील धारा के तट पर चंडिका देवी का मंदिर स्थित है। यहाँ ‘हर की पौड़ी’ नामक एक पक्का घाट है।

हरिद्वार की विशिष्टताएँ और धार्मिक महत्त्व
यात्री इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि हृदिद्वार में केवल गंगा जी ही प्रमुख देवता हैं। यह स्थान इतना निर्मल है कि यहाँ लोभी मनुष्य नहीं ठहरते, बल्कि पंडे और दुकानदार कनखल व ज्वालापुर से आते हैं, और पंडे भी अत्यंत संतोषी स्वभाव के हैं।
पत्र में हरिद्वार के पाँच मुख्य तीर्थो – हर की पौड़ी पर हरिद्धार, कुशावर्त नीलधारा, विल्वपर्वत (जहाँ विल्वेश्वर महादेव हैं) और कनखल का उल्लेख है। कनखल का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व बताते हुए दक्ष यज्ञ और सती के देह-त्याग की घटना का भी वर्णन किया गया है।

यात्री के अनुभव और आध्यात्मिक अहसास
यात्री को हरिद्रार में अपना चित्त अत्यंत प्रसन्न और निर्मल महसूस हुआ। उन्होने ग्रहण में स्नान किया और भागकत का पारायण किया। गंगा तट पर पत्थर पर बैठकर भोजन करने का अनुभव उन्हें सोने की थाल के भोजन से भी बढकर लगा, क्योंकि इससे चित्त में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय हुआ।
उन्हें यहाँ लडाई-झगड़े का नामोनिशान नहीं मिला। पत्र में हरिद्धार के जनेक (महीन और उच्ज्वल) और सुगंधित कुशा (जिसमें दालचीनी, जावित्री की सुगंध आती है) जैसी विशिष्ट वस्तुओं की भी सराहना की गई है।

शब्दार्थ :
- कविवथन सुधा – एक पत्रिका का नाम (जिसके संपादक को यह पत्र लिखा गया है)
- महामहिम – अत्यंत आदरणीय, पूजनीय व्यक्ति के लिए संबोधन
- मित्रवरेषु – मित्रों में श्रेष्ठ या सबसे प्रिय मित्र
- पुण्य भूमि – पदिन्न स्थान (वह भूमि, जहाँ जाने से पुण्य मिलता हो)
- वल्ली – लता, बेल
- मनोरथ – मन की इच्छा, कामना
- लहलहाना – हवा में हिलना-डुलना, लहराना (जैसे फसलें)
- पाम – धूप
- विमुख – मुँह फेरना, निराश होकर लौटना
- बचिकों – शिकारी, हत्यारे, क्रूर लोग
- कल्लोल – आनंदपूर्ण ध्वनि, कलरव (पक्षियों का)
- गलीचा – कालीन, दरी
- जात्रियों – यात्रियों, तीर्थयात्रियों
- बिष्छायत – बिछावन, बिछाई गई वस्तु
- त्रिभुवन पावनी – तीनों लोकों को पवित्र करने वाली (यहाँ गंगा नदी के लिए प्रयुक्त)
- उज्ज्वल कीर्ति – स्वच्छ या शानदार प्रसिद्धि
- लता-सी – बेल के समान
- जल-जंतु – पानी में रहने वाले जीव (मछली, मगरमच्छ आदि)
- पाट – नदी का तल, नदी का फैलाव या रास्ता
- वेग – गति, बहाय की तेज़ी
- इच्छा की खान – बड्डुत अधिक इच्छाएँ रखने वाला
- कनखल – हरिद्यार के पास का एक पौराणिक स्थान
- विलक्षण – अनोखा, अद्भुत, असाथारण
- संतोषी – संतोष रखने वाला, संतुष्ट
- कुशावर्त – हरिद्वार के पास एक तीर्थ स्थान
- विल्वपर्वत – हरिद्वार के पुास एक पर्वत
- विल्वेश्वर महादेव – शिव का एक रूप, जो विल्वपर्वत पर पूजे जाते हैं
- दक्ष – पौराणिक कथाओं में सती के पिता
- धनिक – घनी व्यक्ति, अमीर
- बखेड़ा – झगड़ा, उपद्रब, झंझ्मट
- ग्रहण – घंद्र ग्रहण या सूर्य प्रहण
- आनंदपूर्वक – खुशी-खुशी, प्रसन्नता के साथ
- परमानंदी – परम आनंद में रहने वाला, अत्यंत आनंदित
- ज्ञान – विद्या
- वैराग्य – मोह-माया का त्याग, संसार से विरक्ति
- जनेक – उपनयन संस्कार में धारण किया जाने वाला पवित्र धागा
- दालचीनी – एक सुगंधित मसाला
- जावित्री – एक अन्य सुगंधित मसाला
- सुगंघनय – खुशबूदार
- अपूर्व – जो पहले कभी न हुआ हो, अद्भुत
- साक्षात – प्रत्यक्ष रूप से
- विरक्तों – थैरागी व्यक्तियों
- वृत्तांत – घटना का विस्तृत विवरण