मत बाँधो Class 8 Summary Explanation in Hindi Chapter 7

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मत बाँधो कविता Class 8 Summary in Hindi

मत बाँधो Class 8 Hindi Summary

मत बाँधो कविता का सारांश – मत बाँधो Class 8 Summary in Hindi

यह कविता स्वप्नों की स्वतंत्रता, कल्पना की उड़ान और मानव की रचनात्मक क्षमता का मधुर और प्रेरणादायक चित्रण करती है। कवि लोगों से आग्रह करता है कि वे किसी के भी सपनों को द्बाएँ नहीं, उन्हें उड़ान भरने दें, गति दें, उन्हें ऊँचाई तक पहुँचने का अवसर दें। कवि कहता है कि जैसे सौरभ (सुगंध) एक बार आकाश में उड़ जाए, तो लौटता नहीं और जैसे बीज धूल में गिर जाए, तो वह आकाश में नहीं उड़ सकता, वैसे ही अगर सपनों को उड़ने से पहले ही रोक दिया जाए, तो वे कभी साकार नहीं हो सकते। आग धरती पर जलती है, पर उसका धुआं आकाश में पहुँचता है। यह दर्शाता है कि हर स्वप्न में ऊँचाई की क्षमता होती है। वह आंखों में आकार लेता है तथा रंग, रोशनी और प्रेरणा से भरकर धरती पर लौटता है।

मत बाँधो Class 8 Summary Explanation in Hindi Chapter 7 1

कवि चेतावनी देता है कि यदि हम सपनों का आरोहण (ऊपर उठना) या अवरोहण (गति) रोकेगे, तो समाज विकास से वंचित रह जाएगा। सपने आकाश में जाकर नक्षत्रों में मिलते हैं, फिर धरती पर वर्षा, प्रकाश, रंग और नवचेतना के रूप में लौटते हैं। इन सपनों के माध्यम से ही मनुष्य धरती को स्वर्ग बना सकता है, जीवन को सुंदरता और उद्देश्य दे सकता है।

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मत बाँधो सप्रसंग व्याख्या

काव्यांश 1

इन सपनों के पंख न काटो
इन सपनों की गति मत बाँधो!
सौरभ उड़ जाता है नभ में
फिर वह लौट कहाँ आता है?
बीज धूलि में गिर जाता जो
वह नभ में कब उड़ पाता है?

शब्दार्थ: सपनो-इच्छाएँ, कल्पनाएँ, आकांक्षाएँ, पंख-उइने का साधन (यहाँ प्रतीकात्मक रूप में), गति-रफ्तार, प्रगति, सौरभ-सुगंध, महक, नभ-आकाश, बीज-अंकुर, वृक्ष बनने की संभावनाएँ वाला कण, धूलि-मिट्टी, धूल।

संदर्भ : प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाट्यपुस्तक ‘मल्हार’ में संकलित कविता ‘मत बाँधो’ से लिया गया है। इस कविता की रचयिता महादेवी वर्मा हैं।

प्रसंग : प्रस्तुत काव्यांश में कवयित्री हमें यह संदेश दे रही हैं कि किसी के भी सपनों को दबाया नहीं जाना चाहिए।

व्याख्या : कवयित्री कहती हैं कि सपनों के पंख मत काटो अर्थात् किसी के आत्मविश्वास, सोच और कल्पना को बाधित मत करो। सपनों की गति को बाँधना, किसी की संभावनाओं पर ताला लगाने के समान है। वह उदाहरण देती हैं कि जैसे सौरभ (सुगंघ) एक बार हवा में उडकर दूर चला जाता है और फिर लौटता नहीं, बैसे ही अगर कोई सपना एक बार दबा दिया गया, तो वह फिर कभी जीवित नहीं हो पाता। इसी तरह बीज, जो मिट्टी में दबकर रह जाता है और उचित वातावरण नहीं पाता, वह नभ (आकाश) तक नहीं उड़ सकता अर्थात् जो प्रतिभा समय रहते अवसर नहीं पाती, वह विकास नहीं कर सकती। इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री यह संदेश देती हैं कि सपनों को उड़ने दो, बढ़ने दो, फलने दो यही जीवन की सच्ची प्रगति है।

विशेष :

  1. काव्यांश में बताया गया है कि किसी के भी सपनों को दबाना नहीं चाहिए, क्योंकि सपने ही जीवन को गति और दिशा देते हैं।
  2. काव्यांश की भाषा सहज, लयात्मक और स्पष्ट है, जो सीधे हुदय को घूती है।
  3. काव्यांश में उपमा, अनुप्रास और मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया गया है।

मत बाँधो Class 8 Summary Explanation in Hindi Chapter 7

काव्यांश 2

अग्नि सदा धरती पर जलती
धूम गगन में मैडराता है!
सपनों में दोनों ही गति हैं
उड़ कर आँखों में आता है!
इसका आरोहण मत रोको
इसका अवरोहण मत बाँधो!

शब्दार्थ : धूम-धुआं, गगन-आकाश, मँहराना-चक्कर लगाना, चारों ओर घूमना, गति-चाल, दिशा, प्रवाह, आरोलण-ऊपर चढ़ना, ऊपर की ओर बढ़ना, अवरोहण-नीचे उतरना, नीचे की ओर गति।

संदर्भ : पूर्ववत्

प्रसंग : इस काव्यांश में कवयित्री सपनों की दोहरी दिशा-ऊपर चढ़ने (आरोहण) और नीचे उतरने (अवरोहण) की ओर संकेत करती हैं।

ब्याख्या : कबयित्री कहती हैं कि अग्नि धरती पर जलती है, लेकिन उसका धूम (धुआँ) आकाश में मँडराता है, यह प्राकृतिक नियम है। इसी प्रकार, सपनों में भी दोनों प्रकार की गति होती है-वे भीतर (मन) से उत्पन्न होकर ऊँचाई (कल्पना और सफलता) की ओर जाते हैं। सपनों की यही गति उन्हें मनुष्यता की आँखों में आकार लेने की शक्ति देती है अर्थात् वे हमारी कल्पनाओं और विचारों में जीवंत हो जाते हैं। कवयित्री अनुरोध करती हैं कि इस आरोहण को रोको मत अर्थात् सपनों को ऊपर उठने दो और इसका अवरोहण भी मत बाँधो अर्थात् जब वे प्रेरणा बनकर लौटें, तो उन्हें सीमित मत करो। इस प्रकार, कवयित्री मानव जीवन में सपनों की स्वाभाविक और मुक्त उड्डान को आवश्यक बताती हैं।

विशेष :

  1. काव्यांश में यह संदेश दिया गया है कि सपनों को न रोका जाए और न ही बाँघा जाए, क्योंकि सपने ही जीवन को ऊपर उठाने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
  2. काव्यांश में सपनों की गति और उड़ान की तुलना अग्नि और धूत्र से की गई है, ओ निरंतर ऊपर उठ्ते हैं।
  3. काव्यांश की भाषा सहज, लयात्मक और प्रभावशाली है, जो पाठकों के ह्रदय में उत्साह और ऊर्जा भर देती है।
  4. प्रस्तुत काव्याश में उपमा, अनुप्रास, रूपक और मानवीकरण का सुंदर प्रयोग किया गया है।

काव्यांश 3

मुक्त गगन में विचरण कर यह
तारों में फिर मिल जायेगा,
मेघों से रंग औ किरणों से
दीप्ति लिए भू पर आयेगा।

शब्दार्थ : मुक्त गगन-स्वतंत्र आकाश, विचरण-क्रमण, चक्कर लगाना, इधर-उधर रवतंत्र रूप से घूमना, दीप्ति-चमक, प्रकाश।

संदर्भ : पूर्ववत्।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री कहना चाहती हैं कि जब किसी व्यक्ति को अपने सपनों को खुलकर जीने की स्वतंत्रता मिलती है, तो वे सपने ब्रह्मांड की ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं और वहाँ से प्रेरणा, सौदर्य तथा रोशनी लेकर फिर धरती पर लौटते हैं।

व्याख्या : कवयित्री कहती हैं कि जब कोई सपना स्वतंत्र रूप से मुक्त गगन में उड़ान भरता है, तो वह तारों की दुनिया में समा जाता है अर्थात् वह ऊँचाइयों और महानताओं से जुड़ जाता है। वह सपना केवल कल्पना बनकर नहीं रहता, बल्कि वह बादलों से रंग और सूर्य की किरणों से प्रकाश लेकर धरती पर लौटता है, जिससे दुनिया और भी सुंदर, प्रेरणादायक और उज्ज्वल बन जाती है। पंक्तियों में कवयित्री यह भाव प्रकट करती हैं कि यदि हम सपनों को उड़ान दें, तो वे न केवल स्वयं ऊँचाइयों को छूते हैं, बल्कि समांज और धरती को भी समृद्ध और सुंदर बना सकते हैं।

विशेष

  1. काव्यांश में स्वतंत्र आकाश और उज्ज्यल प्रकाश का चित्रण है।
  2. काव्यांश में सूर्य की किरणें जीवन और प्रेरणा का मतीक हैं।
  3. काव्यांश में उपना, अनुप्रास और मानवीकरण अलंकार का प्रयोग है।
  4. काव्यांश की भाषा सरल, लयपूर्ण और मन को छूने वाली है।

मत बाँधो Class 8 Summary Explanation in Hindi Chapter 7

काव्यांश 4

स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प
भूमि को सिखलायेगा!
नभ तक जाने से मत रोको
धरती से इसको मत बाँधो।
इन सपनों के पंख न काटो
इन सपनों की गति मत बाँधो।

शब्दार्थ : स्वर्ग-अत्यंत सुंदर और सुखद स्थिति या स्थान, शिल्प-कला, रचना, निर्माण की विधि, पंख-उइने का माध्यम (यहाँ स्वप्नों के लिए प्रतीक रूप में)।

संदर्भ : पूर्ववत्।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री कहती हैं कि यदि सपनों को उड़ान भरने दी जाए, तो बे धरती को स्वर्ग बनाने की कला भी सिखा सकते हैं।

व्याख्या : कवयित्री कहती हैं कि यदि किसी के सपनों को स्वतंत्रता दी जाए, तो वे इतने महान हो सकते हैं कि वे स्वर्ग रचने की कला (शिल्प) धरती को सिखा सकते हैं अर्थात् वे दुनिया को सुंदर, सुखमय और श्रेष्ठ बना सकते हैं। कबयित्री आगे कहती हैं कि इन सपनों को नभ (आकाश) तक जाने से मत रोको और न ही इन्हें धरती से बाँधो। ये सपने जहाँ चाहें, जितनी दूर तक उड़ें, क्योंकि इन्हीं की उड़ान से दुनिया में रचना, प्रगति और नवाचार आता है।
अंतिम दो पंक्तियाँ पुन: दोहराकर कवयित्री पूरे संदेश को और भी सशक्त बनाती है-‘इन सपनों के पंख न काटो, इन सपनों की गति मत बाँधो!’

यही इस कविता का केंद्रीय संदेश है-सपनों को स्वतंत्रता दो, उनका समर्थन करो।

विशेष :

  1. काव्यांश में सपनों की महता को बताया गया है।
  2. काव्यांश में सपनों को पंख और गति दी गई है।
  3. काव्यांश में रूपक, अनुप्रास और मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. कार्यांश की भाषा सरल, मभावशाली और प्रेरणादायी है।
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