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Sanskrit Class 8 Chapter 11 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) Summary
सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) Meaning in Hindi
Class 8 Sanskrit Chapter 11 Summary Notes सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
प्रस्तुत पाठ दूसरा भाग है, इसमें वीरवर नाम के राजपुरुष का वर्णन है, जो शूद्रक नामक राजा की सेवा में नियुक्त होता है। अर्द्ध रात्रि में राजा किसी की करुण रोदन ध्वनि को सुनकर वीरवर को देखने के लिए भेजता है । वहाँ एक स्त्री स्वयं को शूद्रक की राजलक्ष्मी बताती है और कहती है कि राजा के जीवन का अंतिम समय आ गया है।
राजा को दीर्घायु करने के लिए वीरवर को अपनी प्रिय वस्तु ‘देवी’ को उपहार देने के लिए कहती है। वीरवर सारी घटना पत्नी व बच्चों को बताता है। वह स्वयं तथा परिवार को देवी को अर्पित कर देता है। राजा यह सब देखकर दुःखी होता है, तभी देवी वहाँ प्रकट होती है तथा राजा और वीरवर की प्रशंसा करती है। इस पाठ में त्याग, समर्पण तथा सेवा – भाव का परिचय मिलता है।

पाठस्य परिचय
वीरवरः नाम कश्चित् राजपुरुषः राज्ञः शूद्रकस्य सेवकरूपेण नियुक्तः । तस्मै वेतनं सुवर्णशतचतुष्टयं दीयते । प्राप्तवेतनस्य अर्धं सः देवकार्ये नियोजयति। एकचतुर्थांशं दरिद्रेभ्यः वण्टयति। अवशिष्टं च एकचतुर्थांशं स्वपत्न्याः हस्ते अर्पयति । स्वखड्गम् आदाय अहर्निशं राजद्वारे रक्षकरूपेण स्थित्वा सः सेवां करोति । एकदा रात्रौ राज्ञः आदेशेन कञ्चित् करुणक्रन्दनध्वनिम् अनुसृत्य सः नगराद् बहिः गच्छति, एकां दिव्याभरणभूषितां कामपि रोदनपरां सुन्दरीं च पश्यति । तस्याः रोदनस्य कारणं पृष्ट्वा जानाति यत् सा राज्ञः शूद्रकस्य राजलक्ष्मीः अस्ति इति ।
तस्याः वचनात् शूद्रकस्य आयुः केवलं दिनत्रयम् एव अस्ति इति ज्ञात्वा तस्य दीर्घायुषः उपायं पृच्छति । ततः राज्ञलक्ष्मीः अतीव दुःसाध्यम् उपायं सूचयति । तस्याः अनुसारं यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु देव्यै सर्वमङ्गलायै उपहाररूपेण समर्पयति, तर्हि तस्य राजा चिरं वर्षशतं जीविष्यति, राजलक्ष्मीरपि तेन सह सुखं स्थास्यति इति । एवं कठिनम् उपायं संसूच्य राजलक्ष्मीः वीरवरं किंकर्तव्यमूढं कृत्वा अदृश्या भवति । गुप्ततया वीरवरम् अनुसरन् राजापि तयोः संवादं शृणोति ।
पाठ का परिचय
अनुवाद वीरवर नाम का कोई राजपुत्र राजा शूद्रक की सेवक रूप में नियुक्त हुआ । उसके लिए (उसे) चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ वेतन दिया जा रहा है। प्राप्त वेतन का आधा भाग वह देव कार्य में लगाता है, एक चौथाई भाग गरीबों के लिए बाँट देता है और बचा हुआ एक चौथाई भाग अपनी पत्नी के हाथ में अर्पण करता है । अपनी तलवार को लेकर रात – दिन राजद्वार पर रक्षक रूप में स्थित रहकर वह सेवा करता है। एक बार रात्रि में राजा के आदेश से करुण क्रंदन की ध्वनि के पीछे वह नगर से बाहर जाता है, एक दिव्य आभूषणों से सुशोभित और रोती हुई सी किसी सुंदरी को देखता है। उसके रोने का कारण पूछकर जानता है कि वह राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी है।
उसके वचनों से शूद्रक की आयु केवल तीन दिन ही है। ऐसा जानकर उसकी दीर्घायु का उपाय पूछता है। तब राजलक्ष्मी बहुत कठिन उपाय सूचित करती है। उसके अनुसार यदि वीरवर अपनी सबसे प्रियवस्तु को देवी सर्वमंगला के लिए उपहारस्वरूप समर्पित करता है, तो वह राजा सौ वर्ष तक जीवित रहेगा। राजलक्ष्मी भी उनके साथ सुख से रह सकेगी और कठिन उपाय सूचित करके राजलक्ष्मी वीरवर को कर्त्तव्यविमूढ़ करके अदृश्य हो गई। गुप्त रूप से वीरवर का अनुसरण करते हुए राजा भी उनके संवाद को सुनता है।
Class 8 Sanskrit Chapter 11 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
1. अथ राजपुत्रो वीरवरो स्वावासं गत्वा निद्रालसां पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत् अखिलराजलक्ष्मी संवादं च अवर्णयत् ।
शक्तिधरः – (तच्छ्रुत्वा सानन्दम्) हे पितः ! जानाम्यहं भवतः सर्वप्रियं वस्तु। तद् अहमेव भवतः प्रियतमः इति सर्वविदितः। धन्योऽहं स्वामिजीवितरक्षार्थं यदि विनियुक्तः । तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ? एवंविधे कर्मणि राष्ट्रस्य राज्ञश्च हिताय मम सर्वस्वविनियोगः
परमश्लाघ्यः । यत-
धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ।।1।।
वेदरता – यद्येवम् अस्मत्कुलोचितं नाचरितव्यं तर्हि गृहीतस्वामिवर्तनस्य कथं निस्तारो भवेत् ?
वीरवती – धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च । तत् कथं विलम्ब्यते ? एष एव गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारस्य उपायः ।
(ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलाया आयतनं गताः)
शब्दार्थाः
स्वावासं = (स्व + आवासं) अपने आवास (घर),
निद्रालसां = नींद के कारण अलसाई हुई,
तच्छ्रुत्वा = (तत् + श्रुत्वा) यह सुनकर के,
जानाम्यहं = (जानामि + अहं) मै जानता हूँ,
अधुना = अब,
श्लाघ्यः = प्रशंसनीय,
परार्थे = दूसरों के लिए,
उत्सृजेत् = त्यागना चाहिए,
वर्तनस्य = वेतन/धन का,
निस्तारो = चुकाना,
ईदृशः = ऐसे,
जनकः = पिता ।
संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक दीपकम् के एकादश अध्याय ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख – भाग)’ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के प्रसिद्ध कथाग्रंथ ‘हितोपदेश:’ से संकलित है। ‘हितोपदेश’ के मूल लेखक नारायण पंडित हैं।
अनुवाद – ऐसे राजपुत्र वीरवर अपने घर जाकर के निद्रा से अलसाई हुई पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाता है और राजलक्ष्मी के संपूर्ण संवाद को बताता है।
शक्तिधर – (यह सुनकर आनंद के साथ) हे पिता ! मैं आपकी सर्वप्रिय वस्तु जानता हूँ। वह मैं ही हूँ, आपका प्रियतम ऐसा सभी जानते हैं। मैं धन्य हूँ कि मैं स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए नियुक्त हुआ हूँ। फिर अब क्या विलंब है ? इस प्रकार के कर्म में राष्ट्र और राज के हित के लिए मेरा सर्वस्व नियुक्त होना अत्यंत प्रशंसनीय है, क्योंकि
“विद्वान् धन और जीवन परोपकार के लिए ही त्याग देते हैं। भली प्रकार से किया गया त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि विनष्ट होना तो शाश्वत है, परम सत्य है अर्थात् धन और जीवन को एक दिन तो नष्ट होना ही है ।”
वेदरता – यदि ऐसा हमारे कुल के अनुसार उचित आचरण नहीं किया गया, तो फिर स्वामी से ग्रहण किए गए वेतन का निस्तारण कैसे होगा ।
वीरवती – मैं धन्य हूँ, जिसके ऐसे पिता और भ्राता हैं। फिर कैसा विलंब? यही स्वामी से ग्रहण किए गए वेतन के निस्तारण का उपाय है।
(फिर वे सभी सर्वमंगला (माता) के घर अर्थात् मंदिर गए)

2. वीरवरः – (देवीपूजां विधाय) भगवति ! प्रसीद, विजयतां महाराजः शूद्रकः, गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः ।
वीरवर: – (स्वगतम्) कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रसमर्पणेन । अधुना पुत्रवियुक्तस्य मे जीवनं निष्फलम्।
(ततः सः आत्मानमपि देव्यै समर्पितवान् । ततस्तस्य पत्न्या दुहित्रा च तदेवाचरितम् । राजा शूद्रकोऽपि तेषां सर्वेषां सर्वमेतद् आचरितम् तददृश्य एवालोकयत् ।) ततोऽसौ व्यचिन्तयत्
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः ।
अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ।। 2 ।।
तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम् । (देवीं प्रति प्रकटयन्) हे मातः ! सर्वमङ्गले! गृहाण मे सर्वस्वम्। नेष्टं मे राज्यं न च जीवितं वा ।
देवी – (ततः प्रत्यक्षीभूतया भगवत्या सर्वमङ्गलया राज्ञः करं धृत्वा) वत्स! प्रसन्ना भवामि त्वयि अलं साहसेन । नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति ।
शब्दार्थाः
वियुक्तस्य = वियोग से,
आत्मानमपि = स्वयं को भी,
अवलोकयत् = देखा,
जायन्ते = जीते हैं,
म्रियन्ते = मरते हैं,
क्षुद्र = छोटे,
सदृशः = समान,
परित्यक्तेन = त्याग से,
अलं = पर्याप्त / रोको।
संदर्भ – पूर्ववत् ।
अनुवाद-
वीरवर – (देवी की पूजा करके) भगवती ! प्रसन्न हो, महाराज शूद्रक विजयी हों, यह मेरे द्वारा दिया गया उपहार ग्रहण करो ।
वीरवर – (स्वयं से) वेतन को पुत्र समर्पण (को अर्पित) से चुका दिया गया है। अब पुत्र के वियोग से मेरा जीवन निष्फल / है, व्यर्थ है।
(फिर उसने स्वयं को भी देवी को समर्पित कर दिया । फिर उसकी पत्नी और पुत्री ने वैसा ही आचरण किया। राजा शूद्रक ने भी उन सभी के संपूर्ण आचरण के दृश्य को देखा।)
फिर उसने विचार किया।
“मेरे जैसे छोटे प्राणी जीते हैं और मरते हैं। इनके समान लोग संसार में न पहले हुए हैं और ना ही होंगे।”
इनके त्याग से मेरे राज्य का क्या प्रयोजन है।
(देवी की ओर देखते हुए) हे माता! सभी का मंगल करने वाली ! मेरा सब कुछ ग्रहण कर लो। मुझे न राज्य की और न प्राणों की इच्छा है।
देवी – (फिर भगवती सबका मंगल करने वाली प्रकट हुई, राजा को हाथ में धारण करके।) पुत्र ! मैं तुम पर प्रसन्न हुई, तुम्हारा साहस पर्याप्त है। अब तुम्हारा राज्य नष्ट नहीं होगा।)
3. राजा – (साष्टाङ्ग प्रणिपत्य) भगवति । न मे प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा । यदि मयि कृपा भगवत्या जाता, तदा ममायुःशेषेणापि प्रत्यावर्तेत राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पन्या दुहित्रा च । अन्यथा मया यथाप्राप्ता गतिर्गन्तव्या जगदम्ब !
देवी – वत्स! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि । तद् गच्छ, विजयी भव । अयमपि सपरिवारो जयतु राजपुत्र आदर्शचरितो वीरवरः ।
ततो देवी गताऽदर्शनम्। ततो वीरवरः सपरिवारो सानन्दं स्वगृहं गतः। नृपतिरपि सर्वेषामदृश्य एव स्वप्रासादं प्राविशत्। अन्येद्युः वीरवरोऽपि पुनः द्वार सेवानिर्तोऽभवत्।
शब्दार्थाः
प्रत्यावर्तेत = वापस कर दो,
सह = साथ,
भृत्य = नौकर / सेवक,
अदर्शनम् = अन्तर्ध्यान,
नृपतिः = राजा,
अन्येद्युः = अगले दिन,
प्रासदं = महल।
संदर्भ – पूर्ववत् ।
हिंदी अनुवाद
राजा – (साष्टांग प्रणाम करके) भगवती ! मुझे राज्य या जीवि रहने की आवश्यकता नहीं है। यदि मुझ पर भगवती की कृपा है, तब मेरी आयु के शेष से भी राजपुत्र वीरवर को पत्नी, पुत्री और पुत्र के साथ वापस कर दो। अन्यथा हे जगदम्बा ! मुझे वैसी ही गति प्राप्त होनी चाहिए।
देवी – पुत्र! मैं आपके सद्गुणों की इस महिमा और अपने सेवकों के प्रति आपके स्नेह से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तब जाओ विजयी हो। यह आदर्श चरित्र युक्त राजपुत्र वीरवर भी अपने परिवार के साथ जीवित हो । फिर देवी अंतर्ध्यान हो गई। तब वीरवर अपने परिवार के साथ आनंद के साथ अपने घर चला गया। राजा भी सबको दिखाई देते हुए ही अपने महल में प्रवेश करता है। अगले दिन वीरवर भी फिर से द्वार पर सेवा में लग गया।
4. राजा – (तं वीक्ष्य) का वार्ता राजपुत्र !
वीरवर: – देव! सा रोदनपरा नारी मद्दर्शनाददृश्यतां गता । न हि कापि वार्ताऽन्या स्वामिन्!
ततः परमां प्रीतिं गतो महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय ।
शब्दार्थाः
तं = उसको,
वीक्ष्य = देखकर के,
रोदनपरा = रोती हुई,
तस्मै = उसके लिए,
कर्णाटप्रदेश = कर्णाटक प्रदेश |
संदर्भ – पूर्ववत् ।
अनुवाद-
राजा – (उसको देखकर) क्या बात हुई राजपुत्र !
वीरवर – हे स्वामी/देव! वह रोने वाली स्त्री मेरे देखते ही अंतर्ध्यान हो गई। दूसरी कोई बात नहीं है स्वामी! तब राजा उससे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने वीरों में श्रेष्ठ राजकुमार को कर्नाटक का संपूर्ण प्रदेश दे दिया ।
अत्र इदम् अवधेयम्
वाच्यं त्रिविधम्।
- कर्तृवाच्यम्
- कर्मवाच्यम्
- भाववाच्यम्।
कर्तृवाच्यम्
कर्तृवाच्ये वाक्ये कर्तृपदस्य प्रथमाविभक्तिः भवति क्रियापदं कर्तृपदानुसारि च भवति ।
अर्थात् क्रियापदस्य पुरुषः वचनं च कर्तृपदस्य अनुसारेण भवति । वाक्ये कर्मपदम् अस्ति चेत् तस्य द्वितीयाविभक्तिः भवति ।
यथा
बालकः ग्रामं गच्छति । त्वं ग्रामं गच्छसि । अहं ग्रामं गच्छामि।
बालकाः ग्रामं गच्छन्ति । यूयं ग्रामं गच्छथ। वयं ग्रामं गच्छामः।
कर्मवाच्यम्
कर्मवाच्ये कर्तृपदस्य तृतीया विभक्तिः, कर्मपदस्य प्रथमाविभक्तिः तथा च क्रियापदं कर्मपदानुसारि भवति ।
यथा
अर्थात् क्रियापदस्य पुरुषः वचनं च कर्मपदस्य अनुसारेण भवति ।
बालकेन ग्रामः गम्यते । त्वया ग्रामः गम्यते । मया ग्रामः गम्यते । बालकेन ग्रामाः गम्यन्ते । युष्माभिः ग्रामाः गम्यन्ते। अस्माभिः ग्रामाः गम्यन्ते।
अत्र ध्यातव्यं यत् कर्मवाच्ये कर्मपदस्य प्रथमा विभक्तिः कर्तृपदस्य च तृतीया विभक्तिः भवति । क्रियापदस्य रूपं “धातुः + य + आत्मनेपदम्–” भवति ।
यथा-गम् (धातु) + य + ते (आत्मनेपदप्रत्ययः) = गम्यते ।
एवं पठ्यते, लिख्यते, खाद्यते इत्यादीनि यकार – सहितानि भाव – कर्मवाचकक्रियापदानि भवन्ति ।
भाववाच्यम्
अकर्तृवाच्यवाक्ये यदि कर्मपदस्य अभावः भवति तर्हि भाववाच्यस्य प्रयोगः भवति । तदा कर्तृपदस्य तृतीया विभक्तिः भवति क्रियापदस्य च केवलम् एकम् एव अपरिवर्तनीयं रूपं भवति। तत् च प्रथमपुरुषस्य एकवचनं रूपम्।
यथा
बालकेन हस्यते। बालकैः हस्यते । त्वया हस्यते। युष्माभिः हस्यते। मया हस्यते। अस्माभिः हस्यते । इत्येवम् ।
अत्र ध्यातव्यं यत् हस्यते इति क्रियापदं कर्तृपदानां परिवर्तने अपि अपरिवर्तनीयं भवति। इदम् अपि ध्यातव्यं यत् केचन धातवः सर्वदा अकर्मकाः भवन्ति ।
यथा हस्, क्रन्द्, स्था, स्ना, शी, भू इत्यादयः ।