Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary

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Sanskrit Class 8 Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Meaning in Hindi

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Summary Notes अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

इस पाठ में कुछ मित्र ग्रीष्मावकाश में ‘उत्तराखंड’ घूमने जाते हैं, वहाँ तेज वर्षा के कारण पुल जाने पर सभी मित्र ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि “हे भगवन हमारी रक्षा करो।” उन मित्रों में नायक सुधीर सभी को सान्त्वना देते हुए वहाँ से निकलने का उपाय बताते हुए एक कहानी सुनाता है। “गोदावरी नदी के किनारे एक शाल्मली वृक्ष है, जहाँ दूर देश से पक्षी आकर रहते थे।

एक बार वहाँ एक शिकारी कुछ चावलों को फैलाकर छिपकर खड़ा हो गया। उसी समय चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा तथा उसका परिवार आकाश मार्ग से जा रहा था। लोभ से आकृष्ट कुछ कबूतर चावल खाने के लिए जमीन पर उतरे, चित्रग्रीव के बार – बार मना करने पर भी वे नहीं माने और शिकारी के जाल में फँस गए।

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary 1

जिसके वचनों से कबूतर वहाँ बँधे, उसका सभी तिरस्कार कर रहे थे। चित्रग्रीव ने कहा हमें कोई उपाय सोचना चाहिए। छोटी वस्तुओं को इकट्ठा करने से कार्य सिद्ध होता है। चित्रग्रीव ने कहा- हम यह जाल लेकर उड़ चलें। सभी कबूतर जाल को लेकर उड़ गए और हिरण्यक के यहाँ पहुँचे। चित्रग्रीव का मित्र होने के कारण हिरण्यक उसके जाल को काँटने लगा, लेकिन चित्रग्रीव ने कहा- पहले मेरे आश्रितों के जाल काँटो | हिरण्यक ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सभी कबूतरों के जाल काट दिए।

कहानी सुनाने के बाद नायक सभी को संबोधित कर कहता है – मित्रों संकट के समय कबूतरों ने बुद्धि – बल और संघटन करने की क्षमता से स्वयं को सुरक्षित कर लिया। तत्पश्चात् सभी पुल निर्माण में जुट गए। सभी के प्रयत्नों से उन्होंने पुल का निर्माण कर अपनी और दूसरों की जान बचाई।

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary 4

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

1. कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् ‘उत्तराखण्डम्’ अगच्छन् । तदानीं वर्षारम्भकालः आसीत्। सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः । यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा। सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः । नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः । पर्वतस्खलनं सञ्जातम् । सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायकः सुधीरः सर्वान् सांत्वयन् प्रेरयन् च अवदत्

नायकः – अयि भोः मित्राणि! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः ।
दिनेशः – (सविषादम्) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति, एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः ?
नायकः – मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।

शब्दार्थाः
कानिचन = कुछ,
प्राप्तवन्तः = पहुँच गए,
आरोहन्त = चढ़ाई,
प्रसृतः = फैल गया,
भग्नः = टूट गया,
अक्रन्दन् = रोये (चिंतापूर्वक),
सविषादम् = दुःख से,
सन्निकटे = पास में,
सम्भूय = मिलकर ।
संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक संस्कृत दीपकम् भाग – 2 के ‘अल्पानापि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका’ पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद – कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्म अवकाश में पुण्य क्षेत्र के दर्शन के लिए देवभूमि ‘उत्तराखंड’ गए। तभी वर्षा काल (बारिश के आने का समय) आरंभ हुआ। सभी गौरीकुंड नामक स्थान पर पहुँचे। जब वे सभी श्रीकेदारनाथ क्षेत्र में चढ़ाई कर रहे थे, तब लक्ष्य पर पहुँचने से पहले ही तेज वर्षा प्रारंभ हुई। अचानक सभी जगह अंधकार फैल गया। नदी के तेज जल के वेग से सेतु (पुल) टूट गया। पहाड़ स्खलित हो गए अर्थात् खिसक गए। सभी जोर से रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि ‘हे भगवान! हमारी रक्षा करो।’ सभी को धैर्यरहित होते हुए देखकर नायक सुधीर ने सबको सान्त्वना देते हुए कहा

नायक – अरे! ओ मित्रों। इस विपत्ति के समय हमें धैर्य रखकर कोई भी उपाय सोचना चाहिए।
दिनेश – (चिंतापूर्वक) अरे भाई ! क्या बोल रहे हो? हमारी मृत्यु पास में ही है ! तो कैसे उपाय सोचें ?
नायक – मित्र ! दु:खी मत हों। जब वर्षा शांत और वातावरण स्वच्छ होगा, तब हम मिलकर सेतु (पुल) और रास्ते का निर्माण कर पुनः अपने लक्ष्य की और जाएँगे ।

2. सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः ?
नायकः – प्रियमित्राणि! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्य सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः । तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति ।
कपिलः – किम् इदं सम्भवति ?
नायकः – नूनं सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं ‘हितोपदेशस्य’ एकां कथां श्रावयामि ।
सर्वेऽपि – (उत्कण्ठया) का कथा ? वंद मित्र ! वद ।
नायकः – सावधानं शृण्वन्तु ।
अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म । अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः । तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म । केचन कपोता: वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन् । ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत्–“कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम्। कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्त्तव्यम् ।” एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत्-आः किमर्थम् एवमुच्यते ?
“वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्।।1।।”

शब्दार्थाः
दुःसाध्यं = कठिन,
शक्नुमः = सकते हैं,
नूनं = निश्चय ही,
श्रावयामि = सुनाता हूँ,
शृण्वन्तु = सुनो,
दूरदेशात् = दूर देश से,
व्याधः = शिकारी (व्याध),
तण्डुलकणान् = चावल के दानों को,
विकीर्य बिखेर कर विस्तीर्य = फैलाकर,
प्रच्छन्नः = छिपा हुआ,
चित्रग्रीवनामा = चित्रग्रीव नाम का अवलोक्य = देखकर,
अविचारितं = चिंतन किए बिना,
अप्रवर्तनम् = प्रवृत्त न होना।
संदर्भ – पूर्ववत् ।
अनुवाद –
सुरेश – ऐसी स्थिति में क्या हम यह अत्यंत कठिन और असंभव कार्य कर सकते हैं?
नायक – प्रिय मित्रों ! हम आत्मविश्वास के बल से यह असंभव कार्य भी मिलकर अवश्य सिद्ध कर सकते हैं। इससे हमें लक्ष्य की प्राप्ति और ( हमारे ) प्राणों की रक्षा भी होगी।
कपिल – क्या यह संभव है?
नायक – निश्चय ही संभव है मित्र ! इस प्रसंग में मैं ‘हितोपदेश’ की एक कथा सुनाता हूँ।
सभी – (उत्सुकता से) कौन – सी कथा ? बोलो मित्र! बोलो।
नायक – सावधान होकर सुनो।
गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल शाल्मली का वृक्ष है। वहाँ
प्रतिदिन दूर देश से पक्षी आकर रहते थे। इसके बाद वहाँ कोई शिकारी चावल के कणों को बिखेरकर, जाल को फैलाकर, छिपकर वहाँ खड़ा हो गया। उसी समय चित्रग्रीव नौम का कबूतरों का राजा अपने परिवार के साथ आकाश मार्ग में जा रहा था। कुछ कबूतर वन के बीच में चावलों के कणों को देखकर लोभ से आकृष्ट हुए। इसके बाद चित्रग्रीव ने चावल के लोभी कबूतरों से कहा – “यहाँ निर्जन वन में चावलों के कण कैसे संभव है, पता लगाओ । यहाँ कोई शिकारी होगा । हमेशा चिंतन किए बिना कोई कर्म नहीं करना चाहिए ।” इन वचनों को सुनकर किसी कबूतर ने गर्व से कहा- ऐसा क्यों कहा जा रहा है?
“वृद्धों की सलाह को संकट के समय गंभीरता से लेना चाहिए, यही तरीका है कि प्रत्येक स्थान की चीजों के बारे में विचार करें, यहाँ तक कि खाते समय भी ।”

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary 2

3. तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः । अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन्। ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म ।
इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः अवदत् – ‘अयम् अस्य दोषो न । अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः । अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन उपायश्चिन्तनीयः, यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्। सत्पुरुषाणां लक्षणं तु

“विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ।।2।।”

शब्दार्थाः
अवतीर्य = उतरकर,
भोक्तुं = खाने में,
प्रवृत्ताः = लगे हुए,
बद्धाः = बँध गए,
यतोहि = क्योंकि कापुरुष,
लक्षणम् = कायर पुरुषों का लक्षण,
युधि = युद्ध |
संदर्भ – पूर्ववत् ।
अनुवाद – उसके वचनों को सुनकर और चित्रग्रीव की अवज्ञा करके सभी कबूतर भूमि पर उतरकर चावलों को खाने में लग गए। इसके बाद वे सभी जाल में बँध गए । तत्पश्चात्, जिसके वचनों से कबूतर वहाँ बँधे उसका सभी तिरस्कार कर रहे थे।
यह देखकर चित्रग्रीव बोला- इसमें इसका दोष नहीं है। बिना बुलाई हुई विपत्ति को जानने में कोई समर्थ नहीं है । इसलिए इस विपत्ति के समय हमारे द्वारा इसका तिरस्कार न करके कोई उपाय सोचना चाहिए, क्योंकि विपत्ति के समय आश्चर्य करना कायरों का स्वभाव होता है। सत्पुरुषों के लक्षण तो
“विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमा, सभा में वाक्पटुता और युद्ध में पराक्रम और यश में रुचि, व्यसन में काव्यशास्त्र सुनना, ये महात्माओं के स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary 6

4. अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्। प्रियमित्राणि ! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम् । अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् । एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः।
अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत् परं तस्य दृष्टिपथात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः । अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः -“स्वामिन्! किमिदानीं कर्तुम् उचितम्?” चित्रग्रीव उवाच – “प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराज: गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति । ” एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य विवरसमीपं गताः । हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच – “सखे हिरण्यक! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे ?’ ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत् — “आः ! पुण्यवान् अस्मि मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः समायातः।”

शब्दार्थाः
अवलम्ब = आश्रित होकर,
प्रतीकारः = उपाय,
चिन्त्यताम् = चिंतन करना चाहिए,
एकचित्तीभूय = एक चित्त होकर,
जालमादाय = जाल लेकर,
उत्पतिताः = उड़ गए,
पाशान् = बंधनों का,
आलोच्य = अच्छी तरह विचार करके,
प्रत्यभिज्ञाय = जानकर,
त्वरया = शीघ्र,
निःसृत्य = निकलकर ।
संदर्भ – पूर्ववत् ।
अनुवाद – इसलिए अब हमारे द्वारा धैर्य का आश्रय लेकर उपाय सोचना चाहिए। प्रिय मित्रो ! छोटी वस्तुओं को एकत्र करने से कार्य सिद्ध होता है। यह नीति वचन लोक प्रसिद्ध है। अतः हमारे द्वारा सभी एक चित्त होकर जाल को लेकर उड़ चले। सभी पक्षी विचारकर जाल को लेकर उड़ गए।

इसके बाद वह शिकारी दूर से जाल को चुराकर ले जाते हुए उनको देखकर पीछे दौड़ा, लेकिन जब पक्षी उसकी दृष्टि से ओझल हो गए, तो शिकारी रुक गया। तब शिकारी को रुका हुआ देखकर कबूतरों ने कहा – “स्वामी ! अब क्या करना उचित है?” चित्रग्रीव बोला – “प्रिय कबूतरों ! हमारा मित्र चूहों का राजा ‘हिरण्यक’ गंगा के तट पर चित्रवन में रहता है। वह अपने दाँतों के बल से हमारी रस्सियाँ अर्थात् जाल को काट देगा।” इस प्रकार चर्चा कर वे सभी हिरण्यक के बिल में चले गए। हिरण्यक अनिष्ट के भय से सदैव सौ द्वारों वाले एक बिल में रहता है। तब हिरण्यक कबूतरों के गिर जाने के भय से आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा । चित्रग्रीव बोला – “मित्र हिरण्यक ! तुम हमसे बात क्यों नहीं कर रहे हो?” तब हिरण्यक उसके वचनों को पहचानकर प्रसन्नता से शीघ्र ही बाहर आया और बोला- अरे ! मैं धन्य हूँ। मेरा प्रिय मित्र चित्रग्रीव आया है।

5. पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविस्मयं क्षणं स्थित्वा अवदत् –‘सखे! किमेतत् ?’ चित्रग्रीवोऽवदत्-” सखे! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम् ।” तत् श्रुत्वा हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति। तदा चित्रग्रीवोऽवदत्–“मित्र ! मा मा एवम् । पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम ।” एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् – “साधु मित्र ! साधु । अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि ।” ततो हिरण्यकः स्वमित्रैः सह सर्वेषां कपोतानां बन्धनानि छिनत्ति स्म। सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन् । सहर्षं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वै कपोताः राजानं चित्रग्रीवं प्रशंसन्ति—“भवतः नीतिशिक्षया नायकधर्मेण च वयं सर्वे सुरक्षिताः । धन्याः वयम्” ।

कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति — “मित्राणि! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन सघटनसामर्थो न च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः, तर्हि किमर्थं वयं सङ्घटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?” नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये सङलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।

शब्दार्थाः
छेत्तुं = काटना,
सत्वरम् = शीघ्र,
उपसर्पति = निकट आता है,
छिनत्तु = काट दे,
आकर्ण्य = सुनकर,
प्रहृष्टमनाः = प्रसन्न मन वाला,
पुलकित = प्रफुल्लित होकर,
तर्हि = तो ।
संदर्भ – पूर्ववत्।
अनुवाद – जाल में बँधे हुए कबूतरों को देखकर आश्चर्य चकित होकर क्षणभर खड़े रहकर (वह) बोला – ‘मित्र ! यह क्या?’ चित्रग्रीव बोला – “मित्र यह हमारी विचार हीनता का फल है।” ऐसा सुनकर हिरण्यक, चित्रग्रीव के बंधन को काटने के लिए शीघ्रता से निकट आता है। तब चित्रग्रीव बोला – ” मित्र ! रुको- रुको। पहले मेरे आश्रित इनके (कबूतरों के) जाल को काटो, फिर मेरे ।” यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्न मन वाला प्रफुल्लित होकर बोला- “ठीक है मित्र ! ठीक है ।

इस आश्रित स्नेह से आप तीनों लोकों पर अधिकार पाने के योग्य हैं।” तब हिरण्यक ने अपने मित्रों के साथ सभी कबूतरों के बंधन काट दिए। सभी कबूतर जाल से मुक्त हो गए। खुशी से आकाश में वापस उड़ते हुए, सभी कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करते हैं – हम सभी आपकी नीति और वीरता की शिक्षाओं से सुरक्षित हैं- “हम धन्य हैं। ” कहानी सुनाने के बाद नायक सभी को संबोधित करता है — “मित्रों ! संकट में कबूतरों ने बुद्धि – बल और संघटन करने की क्षमता से स्वयं को सुरक्षित कर लिया है, तो फिर हम संगठित होकर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सकते?” नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सभी लोग भय, शोक और संशय छोड़कर (पुल) सेतु निर्माण में जुट गए। भागीरथ के प्रयत्नों से उन्होंने पुल का निर्माण कर अपनी और दूसरों की जान बचाई।

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary 7

अत्र इदम् अवधेयम्

ल्यप्-प्रत्ययः
यत्र एकस्याः क्रियायाः समाप्तेः अनन्तरम् उत्तरक्रिया भवति तत्र पूर्वकालिके क्रियाव्यवहारे धातोः क्त्वाप्रत्ययः भवति। तत्रैव यदि धातोः पूर्वं किमपि उपसर्गादिपदं भवति तर्हि क्त्वा प्रत्ययस्थाने ल्यप् भवति । ल्यप्-प्रत्यये य-मात्रम् अवशिष्यते । क्त्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तानि पदानि अव्ययानि भवन्ति। अस्य वाक्येषु प्रयोगः क्त्वा प्रत्ययवत् भवति। यथा तण्डुलकणान् अवलोक्य ( अव + लोक् + ल्यप्) कपोतान् प्रति आह। धैर्यम् अवलम्ब्य (अव + लम्ब् + ल्यप्) प्रतीकारः चिन्त्यताम् ।

विसर्गसन्धिः

• यत्र विसर्गात् परं चकारः अथवा छकार : भवति तत्र विसर्गस्य स्थाने शकारः भवति ।
यथा – कः + चित् = कश्चित् । प्रतीकारः + चिन्त्यताम् = प्रतीकारश्चिन्त्यताम् ।
देवदत्त: + छलेन = देवदत्तश्छलेन ।

• यत्र विसर्गात् परं तकारः अथवा थकारः भवति तत्र विसर्गस्य स्थाने सकारः भवति ।
यथा – चकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम् । नीतिः + तावत् नीतिस्तावत्।

• यदि विसर्गात् पूर्वम् अकारः परं च वर्गस्य तृतीयवर्णः, चतुर्थवर्णः, पञ्चमवर्णः तथा ह य व र ल इत्येतेषु कोऽपि वर्णः भवति तर्हि अकारस्य विसर्गस्य च (अ:) स्थाने ओकारो भवति।

Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary 9

यथा – हिरण्यकः + नाम हिरण्यको नाम । तत: हिरण्यकः = ततो हिरण्यकः ।
व्याधः + निवृत्त: = व्याधो निवृत्तः ।
यदि विसर्गात् पूर्वं पश्चात् च अकारः भवति तत्र पूर्वतनस्य अकारस्य स्थाने विसर्गस्य च (अ:) स्थाने ओकारः भवति ।
यथा – कुतः + अत्र = कुतोऽत्र ।
हितः + अपि = हितोऽपि ।
स: + अस्माकं = सोऽस्माकम् |

अधः प्रदत्तानि ल्यप्-प्रत्ययान्तानि पदानि ध्यानेन पठत अवगच्छत च
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