Class 8 Hindi वसंत Chapter 7 Kya Nirash Hua Jaye Questions and Answers
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क्या निराश हुआ जाए कक्षा 8 हिंदी वसंत पाठ 7 के प्रश्न उत्तर
आपके विचार से
प्रश्न 1.
लेखक ने स्वीकार किया है कि लोगों ने उन्हें भी धोखा दिया है, फिर भी वह निराश नहीं है। आपके विचार से इस बात का क्या कारण हो सकता है ?
उत्तर:
लेखक निराश इसलिए नहीं है कि लोगों ने धोखा दिया है, फिर भी ऐसी घटनाएँ बहुत हैं जब लोगों ने अकारण सहायता की है। समय पड़ने पर ढाँढ़स भी बँधाया है।
प्रश्न 2.
समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और टेलीविजन पर आपने ऐसी अनेक घटनाएँ देखी-सुनी होंगी जिनमें लोगों ने बिना किसी लालच के दूसरों की सहायता की हो या ईमानदारी से काम किया हो। ऐसे समाचार तथा लेख एकत्रित करें और कम-से-कम दो घटनाओं पर अपनी टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
(i) पास के गाँव में जाने वाला मेहमान एक किसान के पास बैठकर पानी पीने लगा। इसके बाद बहुत देर तक बतियाता रहा। चलते समय उसका एक थैला वहीं घट थैला रुपयों से भरा हुआ था। किसान थैला लेकर उसी गाँव की ओर दौड़ा। गाँव के पास वह मेहमान मिल गया। किसान ने उसका रुपयों से भरा थैला लौटा दिया।
(ii) ट्रेन रात में बैरकपुर पहुँचती थी। मुसाफिर इस शहर के लिए अनजान था। उसकी बर्थ के पास दूसरे मुसाफिर ने उसकी परेशानी जानकर अपने मित्र का पता दे दिया। पहला मुसाफिर जब वहाँ पहुँचा तो उसका मित्र कहीं बाहर गया हुआ था। परिवार वालों ने उसको अपने पास ठहरा लिया और अगले दिन सुबह उसे उसके नए दफ्तर में लेकर गए।
प्रश्न 3.
लेखक ने अपने जीवन की दो घटनाओं में रेलवे टिकट बाबू और बस कंडक्टर की अच्छाई और ईमानदारी की बात बताई है। आप भी अपने या अपने किसी परिचित के साथ हुई किसी घटना के बारे में बताइए जिसमें किसी ने बिना किसी स्वार्थ के भलाई, ईमानदारी और अच्छाई के कार्य किए हों।
उत्तर:
दफ्तर में श्री शिवशंकर शर्मा बहुत लड़ाकू प्रवृत्ति के आदमी थे। इनकी साथियों से बिल्कुल नहीं बनती थी। ये अपने साथियों की फर्जी शिकायतें विभाग के अधिकारियों को भेजते रहते थे। श्री रामकुमार इनके सबसे बड़े विरोधी थे। शर्मा जी इनको हर तरह से बदनाम करने की साजिश रचते रहते थे। अचानक शर्मा जी को दिल का दौरा पड़ गया। इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना था। शर्मा जी का बेटा दूर केरल में नौकरी करता था। वह तुरंत नहीं आ सकता था। रामकुमार इन्हें तुरंत अस्पताल ले गए। इलाज के लिए बैंक से अपना पैसा निकालकर दवाई के लिए दे दिया। जब उतने पैसे से काम नहीं चला तो अपने मित्रों से उधार लेकर इनके इलाज में खर्च किया। शर्मा जी ने रामकुमार का यह पैसा अपनी सुविधा से लौटाया। रामकुमार को इससे दिक्कत भी हुई, फिर भी वे कहते थे–“उस समय मैंने जो किया, वही करना उचित था।”
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पर्दाफाश
प्रश्न 1.
दोषों का पर्दाफाश करना कब बुरा रूप ले सकता है ?
उत्तर:
दोषों का पर्दाफाश करना तब बुरा रूप ले सकता है जब गलत पक्ष को बताने के लिए उसमें रस लिया जाता है और दोष बताना ही एकमात्र कर्त्तव्य हो जाता है।
प्रश्न 2.
आजकल के बहुत से समाचार-पत्र या समाचार चैनल ‘दोषों का पर्दाफाश कर रहे हैं। इस प्रकार समाचारों और कार्यक्रमों की सार्थकता पर तर्क सहित विचार लिखिए ?
उत्तर:
बहुत से समाचार-पत्र या समाचार चैनल ‘दोषों का पर्दाफाश कर रहे हैं। दोषों के प्रति जन-जागृति के लिए यह जरूरी है। इसका दोषपूर्ण पहलू यह है कि लगातार प्रसारण से दोषियों को ‘नायक’ का रूप मिलने लगता है। महसूस होने लगता है कि पूरा समाज भ्रष्ट हो गया है। असुरक्षा का भाव बढ़ता जा रहा है। समाचार-पत्र और समाचार चैनल अच्छी बातों को जोर-शोर से प्रस्तुत नहीं करते हैं।
कारण बताइए-
प्रश्न 1.
निम्नलिखित के संभावित परिणाम क्या-क्या हो सकते हैं ? आपस में चर्चा कीजिए, जैसे-“ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है।” परिणाम-भ्रष्टाचार बढ़ेगा।
1. “सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है।”
2. “झूठ और फरेब का रोज़गार करने वाले फल-फूल रहे हैं।”
3. “हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है, गुणी कम।”
उत्तर:
(i) परिणाम-झूठ का रास्ता अपनाने वाले लोग फलेंगे-फूलेंगे।
(ii) परिणाम-सही रास्ते पर चलने वाले लोग कमज़ोर होते जाएँगे।
(iii) परिणाम-दोषी लोगों का बहुमत हो जाएगा और सही काम करने वाले लोग अलग-थलग पड़ जाएँगे।
दो लेखक और बस यात्रा
प्रश्न 1.
आपने इस लेख में एक बस की यात्रा के बारे में पढ़ा। इससे पहले भी आप एक बस यात्रा के बारे में पढ़ चुके हैं। यदि दोनों बस यात्राओं के लेखक आपस में मिलते तो एक-दूसरे को कौन-कौन सी सही बातें बताते? अपनी कल्पना से उनकी बातचीत लिखिए।
उत्तर:
पहली बस यात्रा का लेखक-हमारी बस तो बूढ़ी हो चुकी, बेदम हो चुकी, इसलिए रुक गई है; पर आपकी बस तो नई लग रही है, फिर भी बीच सड़क पर रुक गई है।
दूसरी बस यात्रा का लेखक- मुझे लगता है-बस अचानक खराब हो गई है, लेकिन सवारियाँ डरी हुई हैं कि कहीं उन्हें कोई लूट न ले।
पहली बस यात्रा का लेखक- हमारा ड्राइवर तो नली से इंजन को पेट्रोल पिलाकर चला रहा था। यह शीशी से अपने बच्चों को भी इसी तरह दूध पिलाता होगा।
दूसरी बस यात्रा का लेखक- खैर! हमारी बस इतनी गई-बीती तो नहीं है। कंडक्टर डिपो तक गया है। शायद ठीक वाली बस लेता आए। हमारे बच्चों के लिए दूध और पानी भी लाने के लिए कहकर गया है।
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सार्थक शीर्षक
प्रश्न 1.
लेखक ने लेख का शीर्षक ‘क्या निराश हुआ जाए’ क्यों रखा होगा ? क्या आप इससे भी बेहतर शीर्षक सुझा सकते हैं ?
उत्तर:
लेखक ने ‘क्या निराश हुआ जाए’ शीर्षक के प्रश्न के रूप में रखा है। इस प्रश्न का उत्तर यही हो सकता है कि निराश होने से जीवन चलने वाला नहीं। यही सोचकर यह शीर्षक रखा गया है। इसका दूसरा बेहतर शीर्षक हो सकता है-‘नर हो न निराश करो मन को।’
प्रश्न 2.
यदि ‘क्या निराश हुआ जाए’ के बाद कोई विराम चिह्न लगाने के लिए कहा जाए तो आप दिए गए चिह्नों में से कौन-सा चिह्न लगाएँगे ? अपने चुनाव का कारण भी बताइए।
-, ।!, ?, -, …………..
“आदर्शों की बातें करना तो बहुत आसान है, पर उन पर चलना बहुत कठिन है।” क्या आप इस बात से सहमत हैं ? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
हम प्रश्नवाचक चिह्न (?) लगाएँगे।
लेखक ने प्रश्नवाचक चिह्न वाक्य का प्रयोग सकारात्मक विचार प्रस्तुत करने के लिए लिखा है जिसका वास्तविक अर्थ है कि हमें निराश नहीं होना चाहिए।
हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि आदर्शों की बातें करना तो बहुत आसान है, पर उन पर चलना बहुत कठिन है। जो आदर्शों पर चलता है, अधिकतर लोग उसका विरोध करते हैं और उसको नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। जो केवल आदर्शों की बात करते हैं, दूसरों को उन पर चलने की प्रेरणा देते हैं, वे भी ऐन मौके पर पीछे हट जाते हैं। इन तमाम परेशानियों के बावजूद हमें सही रास्ते पर ही चलना चाहिए।
सपनों का भारत
“हमारे महान मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा।”
प्रश्न 1.
आपके विचार से हमारे महान विद्वानों ने किस तरह के भारत के सपने देखे थे ? लिखिए।
उत्तर:
हमारे महान विद्वानों ने उस भारत के सपने देखे थे जिसमें सच्चाई, त्याग, धर्म, परहित, संयम आदि गुणों को आचरण बनाने वाले लोग हों। लोग मेहनत करें। किसी का शोषण न करें। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय न समझें। धर्मभीरु लोग कानून की कमियों का फायदा न उठाएँ। दरिद्रजनों के सारे अभाव दूर हो जाएँ।
प्रश्न 2.
आपके सपनों का भारत कैसा होना चाहिए ? लिखिए।
उत्तर:
मेरे सपनों के भारत में बेईमान, कामचोर, राष्ट्रद्रोही एवं भ्रष्ट लोगों का कोई स्थान नहीं है। गरीबों का खून चूस कर जेबें भरने वालों के लिए, राष्ट्रीय सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के लिए एकमात्र जेल ही ठिकाना होना चाहिए। भ्रष्ट, घूसखोर, अपराधी लोग संसद में न पहुँचें। अधिकारी और नेता केवल जनहित की ही बात सोचेंगे। जिन लोगों ने देश का पैसा विदेशी बैंकों में चोरी छुपे जमा कराया है, उस पैसे को देश में लाकर कल्याण-कार्यों में खर्च किया जाएगा। जाति-बिरादरी और क्षेत्रवाद को बढ़ाने वाले नेताओं को सत्ता में नहीं आने दिया जाएगा।
भाषा की बात
प्रश्न 1.
दो शब्दों के मिलने से समास बनता है। समास का एक प्रकार है-द्वंद्व समास । इसमें दोनों शब्द प्रधान होते हैं। जब दोनों भाग प्रधान होंगे तो एक-दूसरे में द्वंद्व (स्पर्धा, होड़) की संभावना होती है। कोई किसी से पीछे रहना नहीं चाहता, जैसे-चरम और परम = चरम-परम । भीरु और बेबस = भीरु-बेबस। दिन और रात = दिन-रात।
‘और’ के साथ आए शब्दों के जोड़े को ‘और’ हटाकर (-) योजक चिह्न भी लगाया जाता है। कभी-कभी एक साथ भी लिखा जाता है। द्वंद्व समास के बारह उदाहरण ढूँढकर लिखिए।
उत्तर:
(i) द्वंद्व समास के उदाहरण-
भाग और दौड़ = भाग-दौड़
घर और द्वार = घर-द्वार
ऊँच और नीच = ऊँच-नीच
छोटा और बड़ा = छोटा-बड़ा
भाई और बहिन = भाई-बहिन
नर और नारी = नर-नारी
खरा या खोटा = खरा-खोटा
सुख और दुख = सुख-दुख
भूखा और प्यासा = भूखा-प्यासा
आकाश और पाताल = आकाश-पाताल
देश और दुनिया = देश-दुनिया
पाप और पुण्य = पाप-पुण्य
प्रश्न 2.
पाठ से तीनों प्रकार की संज्ञाओं के उदाहरण खोजकर लिखिए।
उत्तर:
व्यक्तिवाचक संज्ञा- तिलक, गाँधी, मदन मोहन मालवीय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, भारतवर्ष ।
जातिवाचक संज्ञा- समाचार-पत्र, आदमी, व्यक्ति, श्रमजीवी, मनुष्य, दरिद्रजन, कानून, टिकट, स्टेशन, नोट, डिब्बे, बस, डाकुओं, ड्राइवर, कंडक्टर, पानी, दूध।।
भाववाचक संज्ञा- विश्वासघात, धोखा, ढाँढ़स, हिम्मत, शक्ति, आशा, संभावना, मनुष्यता, माफी, धन्यवाद, दुर्घटना, बुराई, अच्छाई, विनम्रता, गलती, संतोष, गरिमा, ईमानदारी, वंचना, घटनाएँ, लोभ, मोह, काम, क्रोध, संयम, आध्यात्मिकता, आक्रोश, भ्रष्टाचार, मूर्खता, फरेब, आस्था, चिन्ता, चोरी, डकैती, तस्करी, ठगी, संग्रह।
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अतिरिक्त प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
दरिद्रजनों की हीन अवस्था को दूर क्यों नहीं किया जा सकता ?
उत्तर:
जिन लोगों को दरिद्रजनों की हीन अवस्था को दूर करने के लिए लगाया गया था, उनका मन हर समय पवित्र नहीं होता। वे लोग अपनी सुख-सुविधा को ज्यादा महत्त्व देते हैं और अपना असली लक्ष्य भूल जाते हैं। इसी कारण से दरिद्रों की दशा में सुधार नहीं हो पाता।
प्रश्न 2.
भीतर-भीतर भारतवर्ष अब भी क्या अनुभव कर रहा है ?
उत्तर:
भीतर-भीतर भारतवर्प अब भी अनुभव कर रहा है कि धर्म कानून से बड़ी चीज है। अब भी सेवा, ईमानदारी और सच्चाई मूल्यों के रूप में मौजूद है।
प्रश्न 3.
हम किन तत्त्वों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं ?
उत्तर:
समाज में जो चरम-परम गलत तरीकों से धन या मान पाना चाहते हैं, हम आज भी उनकी प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं।
प्रश्न 4.
अवांछित घटनाएँ होने पर भी लेखक का क्या विश्वास है ?
उत्तर:
अवांछित घटनाएँ होने पर भी लेखक का विश्वास है कि ईमानदारी और सच्चाई लुप्त नहीं हुई है।
प्रश्न 5.
कुछ नौजवानों ने ड्राइवर को पीटने का हिसाब क्यों बनाया था ?
उत्तर:
बस खराब होने पर कंडक्टर उतर गया और एक साइकिल लेकर चलता बना। लोगों को संदेह हो गया कि उन्हें धोखा दिया जा रहा। इसी कारण से कुछ नौजवानों ने ड्राइवर को पीटने का हिसाब बनाया।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
इन्होंने भारतवर्ष का सपना नहीं देखा था-
(क) तिलक
(ख) गाँधी
(ग) मुहम्मद अली जिन्ना
(घ) रवीन्द्रनाथ टैगोर
उत्तर:
(ग) मुहम्मद अली जिन्ना
प्रश्न 2.
निम्नलिखित में इन्हें जीवन मूल्य नहीं माना जाता-
(क) लोभ
(ख) ईमानदारी
(ग) सेवा
(घ) आध्यात्मिकता
उत्तर:
(क) लोभ
प्रश्न 3.
बस का कंडक्टर लेकर आया-
(क) रोटी
(ख) फल
(ग) दूध
(घ) दाल
उत्तर:
(ग) दूध
प्रश्न 4.
बस गन्तव्य से कितने किलोमीटर पर खराब हो गई?
(क) पाँच
(ख) आठ
(ग) तीन
(घ) दस
उत्तर:
(ख) आठ
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बोध-प्रश्न
निम्नलिखित अवतरणों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(क) मेरा मन कभी-कभी बैठ जाता है। समाचार-पत्रों में ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार भरे रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है, देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया है। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। जो जितने ही ऊँचे पद पर हैं उनमें उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते हैं।
प्रश्न 1.
समाचार-पत्रों में किस प्रकार के समाचार ज्यादातर रहते हैं ?
उत्तर:
समाचार-पत्रों में ठगी, डकैती, चौरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार ज्यादातर रहते हैं।
प्रश्न 2.
आरोप-प्रत्यारोप से क्या लगता है ?
उत्तर:
आरोप-प्रत्यारोप से लगता है जैसे इस देश में कोई ईमानदार आदमी नहीं रह गया है।
प्रश्न 3.
क्या ऐसा सोचना ठीक है ?
उत्तर:
नहीं, ऐसा सोचना ठीक नहीं है।
प्रश्न 4.
ऊँचे पद पर बैठे व्यक्तियों के बारे में लोग क्या सोचते हैं ?
उत्तर:
जो व्यक्ति जितने ऊँचे पद पर बैठा है, उसमें उतनी ही ज्यादा कमियाँ नजर आ रही हैं। स्थिति यह है कि हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।
प्रश्न 5.
क्या हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए ? कारण सहित बताइए।
उत्तर:
नहीं, हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। स्थितियाँ इतनी बदतर नहीं हुई हैं कि कोई ईमानदार ही न बचा हो। अभी भी ईमानदारी जिन्दा है।
(ख) यह सही है कि इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलाने वाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पिस रहे हैं और झूठ तथा फरेब का रोजगार करने वाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है।
प्रश्न 1.
इन दिनों किस प्रकार का माहौल बन गया है ?
उत्तर:
इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बन गया है कि ईमानदारी से रोटी-रोज़ी कमाने वाले भोले-भाले मजदूर पिस रहे हैं। छल-कपट का सहारा लेने वाले फल-फूल रहे हैं।
प्रश्न 2.
मूर्खता का पर्याय किसे मान लिया गया है ?
उत्तर:
ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय मान लिया गया है।
प्रश्न 3.
सच्चाई अब कैसे लोगों के हिस्से में आ गई है ?
उत्तर:
जो लोग डरते हैं, मजबूर हैं, उन्हीं के हिस्से में सच्चाई आ गई।
प्रश्न 4.
जीवन-मूल्यों के प्रति क्या दृष्टिकोण पनपने लगा है ?
उत्तर:
जीवन-मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था डगमगाने लगी है।
प्रश्न 5.
ईमानदारी से मेहनत करने वाले क्यों पिस रहे हैं ? अपना विचार लिखिए।
उत्तर:
झूठ और फरेव का रोजगार करने वालों के कारण ईमानदारी से मेहनत करने वाले पिस रहे हैं।
(ग) भारतवर्ष ने कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया है, उसकी दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान आंतरिक गुण स्थिर भाव से बैठा हुआ है, वही चरम और परम है। लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि विचार मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं, पर उन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत बुरा आचरण है। भारतवर्ष ने कभी भी उन्हें उचित नहीं माना, उन्हें सदा संयम के बंधन से बाँधकर रखने का प्रयत्न किया है। परंतु भूख की उपेक्षा नहीं की जा सकती, बीमार के लिए दवा की उपेक्षा नहीं की जा सकती, गुमराह को ठीक रास्ते पर ले जाने के उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
प्रश्न 1.
भारत ने किस प्रकार के संग्रह को अधिक महत्त्व नहीं दिया ?
उत्तर:
भारतवर्ष में भौतिक वस्तुओं के संग्रह को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया गया है।
प्रश्न 2.
भारत ने चरम और परम किसे माना है ?
उत्तर:
भारत ने मनुष्य के भीतर जो महान गुण स्थिर भाव से मौजूद हैं, उन्हें ही चरम और परम माना है।
प्रश्न 3.
मनुष्य में स्वाभाविक रूप से कौन-कौन से विचार मौजूद रहते हैं ?
उत्तर:
लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि विचार मनुष्य में स्वभाव से मौजूद रहते हैं।
प्रश्न 4.
लेखक ने बुरा आचरण किसे कहा है ?
उत्तर:
लोभ-मोह, काम-क्रोध को ही प्रमुख ताकत मान लेना तथा अपने मन और बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर काम करने देना बुरा आचरण है।
प्रश्न 5.
स्वाभाविक विचारों को किस रूप में रखा गया ?
उत्तर:
स्वाभाविक विचारों को सदा संयम में बाँधकर रखा गया है।
प्रश्न 6.
समाज में किन-किन बातों की उपेक्षा नहीं की जा सकती ?
उत्तर:
समाज में भूख, बीमारी और गुमराह व्यक्तियों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। भूख का उपाय-भोजन, बीमारी का उपाय-दवाई और गुमराह का उपाय-सही रास्ता दिखाना है।
प्रश्न 7.
आपकी दृष्टि से क्या उचित है ?
उत्तर:
हमारे विचार से जीवन में संयम उचित है। संयम के द्वारा ही हम अपनी कमजोरियों पर काबू पा सकते हैं। भूख और बीमारी को दूर करना पड़ेगा। गुमराहों को सही दिशा का ज्ञान भी कराना पड़ेगा।
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(घ) भारतवर्ष सदा कानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा है। आज एकाएक कानून और धर्म में अंतर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को दिया जा सकता है। यही कारण है कि लोग धर्मभीरु हैं, वे कानून की त्रुटियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते।
प्रश्न 1.
भारतवर्ष कानून को किस रूप में देखता आ रहा है ?
उत्तर:
भारतवर्ष सदा से कानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा है। कानून का पालन करना धर्म के दायरे में रहा है।
प्रश्न 2.
आज एकाएक कानून और धर्म में क्या अंतर कर दिया गया है ?
उत्तर:
आज एकाएक कानून और धर्म में यह अन्तर कर दिया गया कि धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता। कानून को धोखा दिया जा सकता है।
प्रश्न 3.
धर्मभीरु लोग किस तरह का आचरण करने लगे हैं ?
उत्तर:
धर्मभीरु लोग कानून की कमियों का लाभ उठाने लगे हैं। उन्हें कानूनन गलत काम करने में तनिक भी झिझक नहीं होती।
(ङ) दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करके उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्घाटन को एकमात्र कर्त्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है। सैकड़ों घटनाएँ ऐसी घटती हैं कि जिन्हें उजागर करने से लोक-चित्त में अच्छाई के प्रति अच्छी भावना जगती है।
प्रश्न 1.
दोषों का पर्दाफाश करना कब बुरी बात बन जाता है ?
उत्तर:
जब पर्दाफाश करना ही एकमात्र काम मान लिया जाता है और गलत पक्ष को प्रकट करके उसमें रस लिया जाता है, तब यह कार्य बुरा बन जाता है।
प्रश्न 2.
अच्छाई के संदर्भ में किस आदत को बुरा कहा गया है ?
उत्तर:
अच्छाई को उजागर न करना, उसमें रस न लेना बुरा है। उजागर न करने से अच्छाई का प्रचार नहीं हो सकेगा, जबकि अच्छाई को उजागर करना लोकचित्त के लिए हितकर है।
प्रश्न 3.
अच्छी बातें क्यों उजागर करनी चाहिए ?
उत्तर:
अच्छाई को उजागर करने से लोगों का ध्यान अच्छी बातों की ओर जाएगा। समाज में अच्छी सोच विकसित होगी।
प्रश्न 4.
अच्छी और बुरी बातों के बारे में आपका क्या सोचना है ? छह वाक्यों में लिखिए।
उत्तर:
बुराई से बचने के लिए ‘बुरा क्या है ?’ इसकी जानकारी होना जरूरी है। लगातार बुराई का प्रचार करना समाज के लिए घातक है। लोग उसे अपनाना शुरू कर देते हैं। संचार माध्यम बुरी घटनाओं को लगातार दिखाकर यह गलती कर रहे हैं। समाज में जो अच्छा है, उसे बार-बार दिखाना चाहिए ताकि लोगों का सकारात्मक दृष्टिकोण बने। लोग अच्छे काम करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाएँ।
(च) ठगा भी गया हूँ, धोखा भी खाया है, परंतु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम की चीज मिलती है। केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखो, जिनमें धोखा खाया है तो जीवन कष्टकर हो जाएगा, परंतु ऐसी घटनाएँ भी बहुत कम नहीं हैं जब लोगों ने अकारण सहायता की है, निराश मन को ढाँढ़स दिया है और हिम्मत बँधाई है। कविवर रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने प्रार्थना गीत में भगवान से प्रार्थना की थी कि संसार में केवल नुकसान ही उठाना पड़े, धोखा ही खाना पड़े तो ऐसे अवसरों पर भी हे प्रभो! मुझे ऐसी शक्ति दो कि मैं तुम्हारे ऊपर संदेह न करूँ।
प्रश्न 1.
ठगे जाने और धोखा खाने पर भी क्या बहुत कम मिला है ?
उत्तर:
ठगे जाने और धोखा खाने पर भी बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात मिला है।
प्रश्न 2.
जीवन कब कष्टकर हो जाता है ?
उत्तर:
यदि केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखा जाए, जिनमें धोखा खाया था तो जीवन कष्टकर हो जाता है।
प्रश्न 3.
किस प्रकार की घटनाएँ पर्याप्त हुई हैं ?
उत्तर:
अकारण सहायता करने की और निराश मन को ढाँढ़स देने की घटनाएँ पर्याप्त हुई हैं।
प्रश्न 4.
कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने प्रार्थना गीत में कैसी शक्ति मांगी है ?
उत्तर:
कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने प्रार्थना-गीत में भगवान के ऊपर संदेह न करने की शक्ति माँगी है।
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(छ) मनुष्य की बनाई विधियाँ गलत नतीजे तक पहुंच रही हैं तो इन्हें बदलना होगा। वस्तुतः आए दिन इन्हें बदला ही जा रहा है, लेकिन अब भी आशा की ज्योति बुझी नहीं है। महान भारतवर्ष को पाने की संभावना बनी हुई है, बनी रहेगी।
प्रश्न 1.
मनुष्य की बनाई विधियों के परिणाम गलत हों तो क्या करना चाहिए ?
उत्तर:
मनुष्य की बनाई विधियाँ गलत हों तो उन्हें बदल देना चाहिए।
प्रश्न 2.
आए दिन क्या किया जा रहा है ?
उत्तर:
आए दिन सफल न होने वाली विधियाँ बदली जा रही हैं।
प्रश्न 3.
अभी भी क्या आशा बनी हुई है ?
उत्तर:
अभी भी आशा बनी हुई है कि हम महान भारतवर्ष को फिर से प्राप्त कर लेंगे। पुराना गौरव लौट आएगा।
क्या निराश हुआ जाए Summary
पाठ का सार
हमारे समाज में बहुत-सी बुराइयाँ आ गई हैं, जिनके कारण चारित्रिक मूल्यों में गिरावट आ गई है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि सब कुछ खत्म हो गया और समाज में अच्छाई नहीं बची है। हर व्यक्ति को सन्देह की दृष्टि से देखा जा रहा है। दोष खोजने वाले दोषों को ही बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में लगे हैं। इससे लगता है कि गुणी व्यक्ति कम हो गए हैं। यह स्थिति परेशान करने वाली है।
कभी संदेह होता है कि क्या यह वही भारत है, जिसका सपना तिलक और गांधी ने देखा था ? क्या आदर्शों का महासमुद्र भारत सूख गया ? वस्तुतः ऐसा सोचना सही नहीं है। यह सही है कि काम करके गुजारा करने वाला ईमानदार व्यक्ति आज परेशान है। मजदूर पिस रहे हैं। धोखे-बाज फल फूल रहे हैं। ईमानदार को लोग मूर्ख समझने लगे हैं। सच्चाई केवल डरपोक लोगों के हिस्से रह गई है।
भारत में संग्रह को महत्त्व नहीं दिया गया है। आंतरिक गुण को ही उत्तम माना गया है। लोभ-मोह आदि विचार हर आदमी में होते हैं, लेकिन इन्हें प्रधान गुण नहीं मान सकते। भारत में संयम को महत्त्व दिया गया। यह सब होने पर भूख या बीमारी की उपेक्षा नहीं की जा सकती। गुमराह को सही रास्ते पर लाना ही होगा। गरीबों का जीवन सुधारने के लिए जो कानून बनाए गए हैं, उनको लागू करने वाले लोग सच्चे मन से इस काम को नहीं कर रहे हैं। लोग कानून की कमजोरियों का लाभ उठाने में पीछे नहीं रहना चाहते चाहे वे धर्मभीरु ही हों।
ऊपरी वर्ग में चाहे जो हो रहा हो, भीतर-भीतर अब भी धर्म कानून से बड़ी चीज है। सेवा, ईमानदारी, सच्चाई कुछ दब जरूर गए हैं, पर नष्ट नहीं हुए हैं। झूठ-चोरी आज भी गलत माने जाते हैं। अखबारों में भ्रष्टाचार के प्रति आक्रोश का यही कारण है कि हम गलत आचरण को रोकना चाहते हैं। दोषों को सामने लाना अच्छी बात है; परंतु उतना ही जरूरी है अच्छी बातों को भी सामने लाना। अच्छाई को छुपाना और भी बुरा है।
लेखक ने रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते हुए दस के बदले सौ का नोट दे दिया, जो टिकट देने वाले ने उनको वापस किया। बस खराब हो जाने पर जब एक बार ड्राइवर को पीटने पर भीड़ उतारु थी, लेखक ने उसे बचाया। तभी बस का कंडक्टर दुसरी ठीक बस लेकर आया, साथ ही लेखक के बच्चों के लिए दूध और पानी भी लेकर आया। इससे पता चलता है कि इंसानियत खत्म नहीं हुई है। धोखा-ठगी का भी सामना करना पड़ता है। पर हम निराश हो जाएं कि अच्छी बातें नहीं बचीं सही नहीं है। जीवन में अच्छा भी बहुत है और वह खत्म नहीं हुआ है।
शब्दार्थ : तस्करी-चोरी से लाया माल; आरोप-लांछन; प्रत्यारोप-आरोप के बदले आरोप; गह्वर-गड्ढा; मनीषी-विद्वान; माहौल-वातावरण; जीविका-रोटी-रोजी; निरीह-इच्छा से रहित, नम्र व शांत; श्रमजीवी-मजदूर; फ़रेब-धोखा; पर्याय–समान अर्थ वाला; भीरु-डरपोक; आंतरिक-भीतरी; विद्यमान-मौजूद; आचरण-चाल-चलन; संयम-नियंत्रण; गुमराह-भटका हुआ; दरिद्रजन-गरीब लोग; धर्मभीरु-अधर्म से डरने वाला; प्रमाण-सुबूत; आध्यात्मिकता-मन से संबंध रखने वाला; व्यक्तिगत-निजी; आक्रोश-विरोध, गुस्सा, चिल्लाहट; प्रतिष्ठा-इज्जत; पर्दाफाश-दोष प्रकट करना; दोषोद्घाटन-दोष प्रकट करना; उजागर-प्रकट करना; लुप्त-गायब; अवांछित-गलत, जिसकी चाह न हो; वंचना-धोखा; निर्जन-सुनसान; कातर-भयभीत, बेचैन; चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना;-घबराना विश्वासघात-विश्वास तोड़ना; कष्टकर-कष्ट देने वाला; अकारण-बिना कारण के; गंतव्य-स्थान जहाँ किसी को जाना हो; ढाँढस-धीरज, दिलासा।
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